Thursday, December 1, 2022

‘आम’ नहीं है आम, खास है सबके लिए

आम शब्द की उत्पत्ति अम्र से हुई है जिसका अर्थ होता है खट्टा, शायद यही अम्र शब्द यात्रा करता हुआ अमृत भी हो गया हो …

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आज बाज़ार में गुलाब खास आम देखा और मुँह में पानी आ गया. फिर मन अकेलेपन में आम के ही ख्यालों में खोने लगा। आम की याद के साथ ही मुझे आचार्य हज़ारी प्रसाद द्विवेदी का लेख ‘आम फिर बौरा गए हैं’ की याद आ गई और आज मैंने  फिर से उस लेख को पढ़ा। 
द्विवेदी जी आशावादी व्यक्ति थे और इस लेख में भी उनका यह गुण अपनी संपूर्णता में प्रकट होता है। इसमें वे कहते हैं कि मानव जाति  का इतिहास बताता है कि वह हर चुनौती से दो दो हाथ कर विजय प्राप्त कर  सकता है। कोरोना काल में इस आश्वासन से मन को बड़ा सम्बल मिलता है। हम इसके पार भी जाएंगे और दुनियाँ फिर से पूर्ववत हो जायेगी।
आम शब्द की उत्पत्ति अम्र से हुई है जिसका अर्थ होता है खट्टा, शायद यही अम्र शब्द यात्रा करता हुआ अमृत भी हो गया हो शायद। पुराने समय में आम का फल के रूप में उतना महत्त्व नहीं था, बल्कि उसकी मंजरियों का ही महत्त्व था। आम का मंजर कामदेव के पांच  पुष्प-बाणों में सबसे प्रमुख था। मदनोत्सव में  स्त्रियां इससे श्रृंगार भी किया करती थीं। 

 

कुछ तो इस फल में ज़रूर है कि कविगुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर को कहना पड़ा था कि  जिस वर्ष उन्हें आम के मौसम में आम खाने को न मिला हो वह वर्ष व्यर्थ रहा

 
संसार में हर वस्तु का स्थान परिवर्तनशील है। भूगोल के जानकार आपको बता देंगे कि आज जहां हिमालय है वहां किसी समय में समुद्र था। आम ने भी फूल होने से फल होने तक की यात्रा की है। अब इसे भाव पर अर्थ की प्रधानता का असर कहें या मानव की प्रकृति को अपने अनुरूप ढालने की क्षमता, लेकिन अब आम्र मंजरियों का महत्त्व लगभग समाप्त हो गया है और आम की प्रतिष्ठा फल रूप में अत्यधिक है।
भारत के हर क्षेत्र का अपना विशिष्ट प्रजाति का आम होता है. महाराष्ट्र के अल्फोंसो ने सिर्फ महाराष्ट्र के आर्थिक उन्नति के कारण आमों का राजा होने का खिताब भले पा लिया हो लेकिन बनारसी व्यक्ति लंगड़ा आम से ऊपर किसी आम को नहीं रखता, मलिहाबाद का व्यक्ति दशहरी को सबसे बेहतर पाता है, पटना वासी दीघा के सफेदा से ऊपर किसी आम को नहीं आंकते, भागलपुर का मालदह आम भी अमृत तुल्य ही होता है। 
आम का मौसम आने को है और ऐसे में आम पर लिखने- पढ़ने से भी  मुँह में मिठास घुल रही है।  कुछ तो इस फल में ज़रूर है कि कविगुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर को कहना पड़ा था कि  जिस वर्ष उन्हें आम के मौसम में आम खाने को न मिला हो वह वर्ष व्यर्थ रहा। 

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