बघेली लोक साहित्य में जाड़ा - pravasisamwad
December 29, 2025
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बघेली लोक साहित्य में जाड़ा

बाबूलाल दाहिया

वैसे तो ठंड नवंबर में धीरे-धीरे ही आती है पर कश्मीर में बर्फवारी के कारण इस वर्ष बीस-बाईस नवंबर से ही 10-11 डिग्री में पहुंच कर अपनी औकातदिखाने लगी है. हमारी बघेली मौखिक परंपरा में जाड़े पर अनेक कहावतें पाई जाती हैं.किसी लोक रचनाकार ने तो जाड़े के मुंह से ही हम सत्तरोत्तरवालों के लिए यह चौबोलवा कहलवा दिया है कि

 “लड़कन से बोलवनही, ज्वान मोर भाई,

बूढ़न का छोड़व नही, चाह ओढ़य रजाई.

यद्दपि अब लोगोंके पास ओढ़ने बिछाने के लिए पहले की अपेक्षा पर्याप्त कपड़े हैं. परंतु प्राचीन समय में जब अक्सर ग्रामों की दशा मुंसी प्रेमचंद कीकहानी (पूस की रात्) जैसी रहती थी और सथरी हेतु जमीन में कोदो का पुआल तथा ओढ़ने के लिए भेड़ के बाल के देसी कंबल और कथरी से हीजाड़ा कटता था तब कंबल पर कई कहावतें थीं. एक कहावत थी कि

“जे जानय कंबल का भेद,वा मूंदय कंबल के छेद.”

 यानी कि अगर कंबल के बुनाई के बीच के छिद्रों को किसी चद्दर से ढक दिया जाय तो फिर कंबल ओढ़ने वाले को जाड़ा नहीं सताता? पर एककहावततो इस प्रकार अतिशयोक्ति पूर्ण भी रची गई थी जिसमें कहा गया हैकि “अगर कंबल के ऊपर पिछौरी (चद्दर) डाल ली जाय तो जाड़ाचिरौरी (विनती) करने लगता है- “कंबल ऊपर सटय पिछौरी, जाड़ बिचारा करयचौरी.”

इस तरह हमारे बघेली लोक साहित्य में अनेक कहावतें एवं लोक कथाएं इस जाड़े के ऊपर पाई जाती हैं.कहते हैं जाड़े मेंकिसी मेहमान का घर आजाना उस जमाने में उसके लिए किसी आफत से कम नहीं हुआ करता था.शायद इसीलिए कहा गया रहा होगा कि “जाड़े मा बइरिउ घरय आमयनमेहमान” यानी जाड़े में तो दुश्मन के घर भी मेहमान ना आए.

यही कारण था कि उस जमाने में मेहमानों को अगर दस बीस कोस की पैदल यात्रा करनी पड़ती तो बीच में कहीं रुकना अवश्य पड़ता था. परंतु वहकिसी के मोहताज होने के बजाए अपने साथ पीठ पर एक रजाई अथबा पिछौरी सहित कंबल बांध कर ही चलते थे. फिर भी एक पहेली के अनुसारएक मेहमान बगैर रजाई कंबल के ही रिस्तेदार के घर पहुंच ही गए. उस गृहस्थ ने भोजन तो दिया और जमीन में नीचे बिछाने के लिए कोदो के पुवालकी सथरी भी दी परंतु छः सदस्यीय परिवार में ओढ़ने के लिए मात्र तीन कथरी और एक कंबल ही था.

उस परिवार के बूढ़े पिता एक कंबल ओढ़ते, एक कथरी को उसकी मां और गृहस्थ की बड़ी बेटी लाही ओढ़ती. साथ ही एक को पत्नी और उसकीछोटी बेटी लूही ओढ़ लेतीं तथा एक कथरी वह खुद ओढ़ता. भोजन तोकराया परभोजनोपरांत समस्या यह आई कि “मेहमान को क्या ओढ़ाया जाय?”

जब उनकी समझ में समस्या का निदान न आया तो बहू ससुर के समीप जाकर बोली कि “दद्दा घर में तो तीन कथरी और आप वाला कंबल ही है, इनमेहमान को क्या ओढ़ाया जाय?”

बूढ़े तो अनुभव जनित ज्ञान की चलती-फिरती लाइब्रेरी होते हैं. उन्होंने एक ही पहेली नुमा कहावत में समस्त समस्या सुलझा दी कि –

“लाही लूही एकयसाथ, लाठ क लूमरतोरे साथ. तोर सास ता मोरे साथ.

अर्थात, एक कथरी को लाही और लूही दोनों बेटियां ओढ़ लेंगी. एक को तुम दोनों ओढ़ लेना और एक को मैं और तुम्हरी सासू ओढ़कर इस आसन्नसंकट से निजात पा लेंगे. अब बचा मेरा वाला कंबल तो उसे मेहमान को दे देना. दो-तीन दिन से पड़ रहे जाड़े ने कहावतें याद करा दीं.

साभार: Pehachaan.com

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