किसी भी भाषा की उन्नति उस देश के नेतृत्व की इच्छा शक्ति पर निर्भर करती है।जब हिंदी बोलने वालों को दोयम दर्जे का माना जाने लगाए तब भारत में ऐसे नेता भी पैदा हुए जिन्होंने भारत में ही नहीं भारत के बाहर भी अपनी मातृभाषा में अपनी बात रखकर हिंदी भाषियों का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया और हिंदी का मान दुनिया भर में बढ़ाया राजकुमार जैन 14 सिंतम्बर 1949 को भारत की संविधान सभा ने हिंदी को राजभाषा के रूप में स्वीकार किया