world Archives - Page 10 of 12 - pravasisamwad
Browse Tag

world - Page 10

दास्तान-ए-इश्क़ भाग #7

इश्क़ में हर पटाक्षेप के बाद भी हल्की सी टीस रह ही जाती है, विशेषकर तब जब आपका महबूब गुज़रते वक़्त के साथ सुंदर होता जाए।समझा जाए तो वो ताजमहल होती गई और मैं अपने तमाम ज्ञान के साथ नालंदा विश्वविद्यालय का खंडहर PRAVASISAMWAD.COM गया एक महान तीर्थ है, मोक्षधाम है।  मोक्ष हिन्दू धर्म की मान्यताओं में आत्मा की सर्वोत्तम परिणति है। जीवित व्यक्ति के लिए गया अभी भी तीर्थ गयाजी कम और गयासुर राक्षस अधिक है। फिर भी जिस-तिस प्रकार गया प्रवास पूरा हुआ। One who is down, fears no fall के पाश्चात्य ज्ञान के आधार पर मैंने भाग्य को चुनौती दी थी कि अब गया से गई बीती जगह पर मेरा तबादला क्या होगा? भाग्य ने चुनौती स्वीकार की और मेरे पदस्थापन रक्सौल हुआ। रक्सौल भारत-नेपाल सीमा पर अवस्थित एक स्थान है जिसे आप अपनी स्वेच्छा और सुविधा के हिसाब से गाँव, शहर, कस्बा अथवा नरक कह सकते हैं। धूमिल ने कहीं लिखा है : ‘जहन्नुम कचहरी से चल रहा है’, नर्क से न सही न्यायालय से परिचित हूँ और चित हूँ। इसी तर्ज पर मैं भी कह सकता हूँ कि नर्क से न सही रक्सौल से परिचित हूँ और चित हूँ। जाम, ट्रैफिक, गंदगी, भ्रष्टाचार आदि तमाम यातनाएँ इस स्थान का परिचय हैं। हल्की फुहार के बाद ही आपको पता न चलता कि सड़क पर कीचड़ है अथवा आप किसी विशाल नाले में हैं। वैसे रक्सौल नाम की व्युत्पत्ति का एक रोचक मौखिक इतिहास सुना। “अंग्रेज अधिकारी लगान वसूल करने जब रक्सौल जाते तो यहाँ के निवासी भागकर नेपाल चले जाते, फिर जब वे लौट जाते तो वे पूर्ववत रक्सौल चले आते। ऐसा जब एकाधिक बार हो गया, तो अंग्रेज़ अधिकारी ने खीझ और झुंझलाहट में कहा रास्कल्स। रक्सौल उसी रास्कल्स का भोजपुरी अपभ्रंश है।” मैं इसकी पुष्टि नहीं करता, पर अब तो समाचार-पत्र से लेकर अन्य माध्यम तक अपुष्ट जानकारी देते ही रहते हैं, ऐसे में TRP के लिहाज से महत्त्वपूर्ण और रोचक तथ्य अपुष्ट होने पर भी साझा किए ही जा सकते हैं। यह हमारे यहाँ चलन में है, जल्द ही झूठ हमारी परंपरा का हिस्सा होगी। रक्सौल में मेरा इश्क़ दूरसंचार से चल रहा था। फ़िराक था सो खूब शराब पी जा रही थी और खूब शायरी पढ़ी जा रही थी। मैंने इज़हार-ए-मोहब्बत कई बार किया पर उसने हर बार टाल दिया। न इक़रार, न इनकार। मेरी हालत उस परीक्षार्थी की तरह थी जिसकी परीक्षा खराब गई थी मगर मात्र भाग्य और भगवान के भरोसे उत्तीर्ण होने की हल्की उम्मीद भी थी। यह स्थिति बड़ी कठिन होती है। हम रोज़ बात करते, पर इस सवाल पर वो कन्नी काट जाया करती। मुझे समझ लेना चाहिए था, जो कि मैंने कुछ विलम्ब से किया, कि वह “न ब्रूयात अप्रियं सत्यं” के मधुर सनातन सिद्धान्त पर चल रही थी। अहमद फ़राज़ के इस शेर इससे पहले कि बेवफा हो जाएँ, क्यों न ए दोस्त हम जुदा हो जाएँ तू भी हीरे से बन गया पत्थर, हम भी कल जाने क्या से क्या हो जाएँ से हमने इस कहानी का भी पटाक्षेप किया। इश्क़ में हर पटाक्षेप के बाद भी हल्की सी टीस रह ही जाती है, विशेषकर तब जब आपका महबूब गुज़रते वक़्त के साथ सुंदर होता जाए। समझा जाए तो वो ताजमहल होती गई और मैं अपने तमाम ज्ञान के साथ नालंदा विश्वविद्यालय का खंडहर। क्रमशः…

दास्तान-ए-इश्क़ भाग #6

इश्क़ के अंकुर निकले और वे भी वहाँ जहाँ इसकी संभावना सबसे कम थी। यह मेरे जीवन का सबसे सेक्युलर काल था PRAVASISAMWAD.COM मेरा पहला पदस्थापन गया हुआ था, जो गया हुआ पदस्थापन ही था। गया के विषय में प्रचलित है कि वहाँ की नदी में पानी नहीं, पहाड़ों पर पेड़ नहीं और आदमी में माथा नहीं। पहले दो तो स्पष्ट ही दिख जाते हैं, तीसरे के लिए कुछ वक़्त गया में बिताना पड़ता है। ABC बैंक की AC बिगड़ी हुई थी, संस्कृति सुधार की सीमाओं को लाँघकर बिगड़ी हुई थीं और ऐसे में यह ख्याल कि फ़ैज़ ने यह शेर ABC बैंक वालों को ही ध्यान में रखकर लिखा होगा सहसा मन मे आ ही जाता है। दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दिया तुझ से भी दिल–फ़रेब हैं ग़म रोज़गार के कहने को दो शिफ़्ट लगती थी पर हम सुबह 8 से शाम 8 तक कैश काउंटर चलाते थे। फुर्सत साँस लेने की भी नहीं थी, लेकिन जीवन का प्रस्फुरण आदर्श परिस्थितियों का मोहताज नहीं होता। इश्क़ के अंकुर निकले और वे भी वहाँ जहाँ इसकी संभावना सबसे कम थी। यह मेरे जीवन का सबसे सेक्युलर काल था और इस काल में मैं हिन्दू-मुसलमान में परस्पर वैवाहिक संबंधों का जबरदस्त पक्षधर रहा। कुछ दिनों बाद मैंने अपना ध्यान धार्मिक एकता से हटाकर जातीय एकता पर लगाया। इश्क़ ने स्वयंसेवकों की शाखा से मुझे ऐसा तोड़ा कि मैं न मनुवादी ही रहा, न संघी। ख़ैर, यहाँ मयकशी में मैंने नित नए परचम लहराए। सुबह 6 बजे तक पीते रहने के बाद पौने 8 बजे शाखा में उपस्थित होने से लेकर, शाम 8 बजे से रात 11 बजे तक शाखा में पीने तक, सब कुछ किया गया। इस काल में मुझे ज्ञात हुआ कि भारतीय स्त्रियों को शराब से कुछ विशेष बैर है। यह ज्ञान आते-आते जीवन में 28 पतझड़ बीत चुके थे। इस तरफ़ बहार शायद आई ही नहीं या आई भी तो बिना मुझसे मिले चली गई। अकबर इलाहाबादी का यह शेर पढ़ते हुए वक़्त कट रहा था वो गुल हूँ ख़िज़ाँ ने जिसे बर्बाद किया है उलझूँ किसी दामन से मैं वो ख़ार नहीं हूँ और तब तक शाखा प्रबंधक के पद पर प्रोन्नति के साथ पदस्थापना का पत्र मिला। अब लगने लगा कि बस-अंत ही नहीं होता, बसन्त भी होता है। क्रमशः… ************************************************************************ Readers These

आइए अब ऑक्सीजन की फसल उगाएँ!

ऑक्सीजन खोजने वालों ने उस समय इसे मात्र प्राणवायु समझा। अर्थात समस्त प्राणियों के जीवन का आधार। किंतु उन्हें क्या पता था कि एक दिन आगे चलकर यह मुद्दों के भी जीने का आधार बनेगी। PRAVASISAMWAD.COM अमर तिवारी हमारा देश कृषि प्रधान है क्योंकि अस्सी प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर है। किंतु आजकल कृषि पर निर्भरता का ठीक-ठीक आकलन मुश्किल है। जो किसान जहां है वहीं वाटर प्रूफ ही नहीं बल्कि एयर कंडीशन्ड टेंट में धरने पर बैठा है। ऐसी स्थिति में खेती किसानी का पक्का पक्की आंकड़ा निकालना अभी संभव नहीं। वैसे कृषि चर्चा के बीच एक नई फसल आजकल ज्यादा मुनाफा दे रही है। नाम है आक्सीजनण्ण्!  यह एक रासायनिक तत्व है और इसे रंगहीन गंधहीन तथा स्वादहीन कहा गया है। किंतु अब इसमें पहले वाली बात नहीं रही। अब यह रंग गंध और स्वाद युक्त भी हो गया है। चकाचक लल्लनटॉप लगभग ढाई सौ साल पहले कार्ल शीले नामक वैज्ञानिक ने पोटेशियम नाइट्रेट को गर्म करके इसे तैयार किया था। पुनः जोसेफ प्रीस्टले ने मरक्यूरिक ऑक्साइड गर्म करके इसे तैयार किया। तब इसके आविष्कारकों ने इसे प्राणवायु कहा। शायद इसके पहले लोग बाग इसे इस रूप में नहीं जानते थे। जाहिर हैए सांस भी नहीं लेते होंगे ! भला हो उसका जिसने ऑक्सीजन  की खोज कर डाली। वरना दुनिया में कितनी सांसे इसके अभाव में थम गई होतीं । इसके खोजने वालों ने उस समय इसे मात्र प्राणवायु समझा। अर्थात समस्त प्राणियों के जीवन का आधार। किंतु उन्हें क्या पता था कि एक दिन आगे चलकर यह मुद्दों के भी जीने का आधार बनेगी। इसे लेकर आजकल चारों तरफ एक नया बवंडर मचा हुआ है। जीवन प्रदान करने वाले ऑक्सीजन पर एक नया चार्ज लगाया गया है। उसके कारण कितनी मौतें हुईं और कितनी जाने बचीं! कितने लोग जन्नत और जहन्नुम के बीच अभी पैदल यात्रा कर रहे हैं और इन सब के लिए इसका जिम्मेदार कौन है इस सब्जेक्ट पर कौन किसे टोपी पहना रहा है और कौन किसकी टोपी उतार रहा है।सिलेंडर क्यों नहीं मिल रहा जिसमें ऑक्सीजन नामक प्राणवायु को कैद करके रखा गया है गंगा आए कहां से गंगा जाए कहां रे की तर्ज पर ये सिलेंडर आए कहां से और ये सिलेंडर जाए कहां रे चिंतन का एक नया यक्ष प्रश्न बन चुका है। अच्छा है कि यह कलयुग में उठा प्रश्न है अन्यथा युधिष्ठिर जी महाराज भी अनुत्तरित रह जाते। दुर्भाग्य की पराकाष्ठा है कि पूरा विश्व महामारी से जूझ रहा है। वहीं एक अच्छी खबर यह है कि ताबड़तोड़ वैक्सीन उत्सव में ढोल की मधुर ध्वनि भी चहुंओर उफान पर है। कहीं कमी का ढिंढोरा तो कहीं  लाखों लाख रिकॉर्ड वैक्सीनेशन  की घोषणा! आखिर पदार्थ के तीनों रूप  ठोस द्रव और गैस सबकी खेती इसी मौसम में हो रही है। देखिए कभी-कभी ऐसा लगने लगता है। परन्तु सच में हो न हो इसलिए रेडीमेड सुरक्षात्मक डिस्क्लेमर स्मरण कर लेना चाहिए। क्योंकि ऐसी स्थिति में जिसने भी पॉजिटिव बनने प्रयास किया उसकी तो खैर नहीं। वैसे पॉजिटिव आत्माओं की थन दुहने के लिए ऑक्टोपसों की पूरी टीम का हरकत में आना उनकी प्रकृति है कोई दोष नहीं। सौ पचास का सामान आज कितने में मिलेगा इसकी गारंटी मनुष्य क्या उसके सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी के पास भी नहीं। पूरा खेती किसानी कन्फ्यूजन में है. मेरी प्यारी बिटिया बुद्धिमती की मंदबुद्धि माता भी कन्फ्यूजिआई हुई बुदबुदा रही है सुनिये जी! आश्वासनों की आस से अच्छा है पर्यावरण पर नैसर्गिक और सकारात्मक विश्वास! अस्तु अच्छा रहेगा कि अपना हाथ जगन्नाथ की तर्ज पर अपनी रक्षा के लिए स्वयं प्राकृतिक ऑक्सीजन की फसल उगायें! और हाँ इसे सूँघें भी!!   आवश्यकता पड़ने पर प्राणवायु ऑक्सीजन मिले न मिले किंतु प्रत्येक चैनल पर इसके विज्ञापन अवश्य मिल जाएंगे। विलंब कहां हुआ कौन इसका वास्तविक जिम्मेदार है, किसने इसकी सप्लाई पाइप काटी किसने मॉक ड्रिल किया किसने इसमें अपनी टांग अड़ाई यह बताने के लिए मुस्कुराते हुए रंग.बिरंगे मोफलर. बेमोफलर चेहरे भी दिखेंगे। यही जानने के लिए इन्हें गौर से देखिये  और पूरी गंभीरता से देखते रहिये। विश्वास करिये एक न एक दिन ऐसा अवश्य आएगा जब  ऑक्सीजन का वह प्राणदायी सिलेंडर सबके पीछे खड़ा होगा। उसमें से निकलती हुई रंगीन पाइप प्रत्येक जरूरतमंद के नाक में होगी और वे इसे सूँघते नजर आएंगे। अब प्रचुर मात्रा में इसकी खेती प्रारंभ हो रही है। हर जगह मतलब यहां वहां जहां तहां मत पूछो कहां कहां सूचना है कि तीसरी लहर से सुरक्षा की तैयारी के आदेश निर्गत कर दिए गए हैं। किंतु कब तक फसल कटेगी यह गारंटी नहीं! पूरा खेती किसानी कन्फ्यूजन में है. मेरी प्यारी बिटिया बुद्धिमती की मंदबुद्धि माता भी कन्फ्यूजिआई हुई बुदबुदा रही है। सुनिये जी! आश्वासनों की आस से अच्छा है पर्यावरण पर नैसर्गिक और सकारात्मक विश्वास! अस्तु अच्छा रहेगा कि अपना हाथ जगन्नाथ की तर्ज पर अपनी रक्षा के लिए स्वयं प्राकृतिक ऑक्सीजन की फसल उगायें! और हाँ इसे सूँघें भी!! (लेखक वरिष्ठ व्यंग्य साहित्यकार एवं स्तंभकार हैं) — साभार हॉटलाइन
1 8 9 10 11 12
Go toTop