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दास्तान-ए-इश्क़ भाग #7

इश्क़ में हर पटाक्षेप के बाद भी हल्की सी टीस रह ही जाती है, विशेषकर तब जब आपका महबूब गुज़रते वक़्त के साथ सुंदर होता जाए।समझा जाए तो वो ताजमहल होती गई और मैं अपने तमाम ज्ञान के साथ नालंदा विश्वविद्यालय का खंडहर PRAVASISAMWAD.COM गया एक महान तीर्थ है, मोक्षधाम है।  मोक्ष हिन्दू धर्म की मान्यताओं में आत्मा की सर्वोत्तम परिणति है। जीवित व्यक्ति के लिए गया अभी भी तीर्थ गयाजी कम और गयासुर राक्षस अधिक है। फिर भी जिस-तिस प्रकार गया प्रवास पूरा हुआ। One who is down, fears no fall के पाश्चात्य ज्ञान के आधार पर मैंने भाग्य को चुनौती दी थी कि अब गया से गई बीती जगह पर मेरा तबादला क्या होगा? भाग्य ने चुनौती स्वीकार की और मेरे पदस्थापन रक्सौल हुआ। रक्सौल भारत-नेपाल सीमा पर अवस्थित एक स्थान है जिसे आप अपनी स्वेच्छा और सुविधा के हिसाब से गाँव, शहर, कस्बा अथवा नरक कह सकते हैं। धूमिल ने कहीं लिखा है : ‘जहन्नुम कचहरी से चल रहा है’, नर्क से न सही न्यायालय से परिचित हूँ और चित हूँ। इसी तर्ज पर मैं भी कह सकता हूँ कि नर्क से न सही रक्सौल से परिचित हूँ और चित हूँ। जाम, ट्रैफिक, गंदगी, भ्रष्टाचार आदि तमाम यातनाएँ इस स्थान का परिचय हैं। हल्की फुहार के बाद ही आपको पता न चलता कि सड़क पर कीचड़ है अथवा आप किसी विशाल नाले में हैं। वैसे रक्सौल नाम की व्युत्पत्ति का एक रोचक मौखिक इतिहास सुना। “अंग्रेज अधिकारी लगान वसूल करने जब रक्सौल जाते तो यहाँ के निवासी भागकर नेपाल चले जाते, फिर जब वे लौट जाते तो वे पूर्ववत रक्सौल चले आते। ऐसा जब एकाधिक बार हो गया, तो अंग्रेज़ अधिकारी ने खीझ और झुंझलाहट में कहा रास्कल्स। रक्सौल उसी रास्कल्स का भोजपुरी अपभ्रंश है।” मैं इसकी पुष्टि नहीं करता, पर अब तो समाचार-पत्र से लेकर अन्य माध्यम तक अपुष्ट जानकारी देते ही रहते हैं, ऐसे में TRP के लिहाज से महत्त्वपूर्ण और रोचक तथ्य अपुष्ट होने पर भी साझा किए ही जा सकते हैं। यह हमारे यहाँ चलन में है, जल्द ही झूठ हमारी परंपरा का हिस्सा होगी। रक्सौल में मेरा इश्क़ दूरसंचार से चल रहा था। फ़िराक था सो खूब शराब पी जा रही थी और खूब शायरी पढ़ी जा रही थी। मैंने इज़हार-ए-मोहब्बत कई बार किया पर उसने हर बार टाल दिया। न इक़रार, न इनकार। मेरी हालत उस परीक्षार्थी की तरह थी जिसकी परीक्षा खराब गई थी मगर मात्र भाग्य और भगवान के भरोसे उत्तीर्ण होने की हल्की उम्मीद भी थी। यह स्थिति बड़ी कठिन होती है। हम रोज़ बात करते, पर इस सवाल पर वो कन्नी काट जाया करती। मुझे समझ लेना चाहिए था, जो कि मैंने कुछ विलम्ब से किया, कि वह “न ब्रूयात अप्रियं सत्यं” के मधुर सनातन सिद्धान्त पर चल रही थी। अहमद फ़राज़ के इस शेर इससे पहले कि बेवफा हो जाएँ, क्यों न ए दोस्त हम जुदा हो जाएँ तू भी हीरे से बन गया पत्थर, हम भी कल जाने क्या से क्या हो जाएँ से हमने इस कहानी का भी पटाक्षेप किया। इश्क़ में हर पटाक्षेप के बाद भी हल्की सी टीस रह ही जाती है, विशेषकर तब जब आपका महबूब गुज़रते वक़्त के साथ सुंदर होता जाए। समझा जाए तो वो ताजमहल होती गई और मैं अपने तमाम ज्ञान के साथ नालंदा विश्वविद्यालय का खंडहर। क्रमशः…

दास्तान-ए-इश्क़ भाग #6

इश्क़ के अंकुर निकले और वे भी वहाँ जहाँ इसकी संभावना सबसे कम थी। यह मेरे जीवन का सबसे सेक्युलर काल था PRAVASISAMWAD.COM मेरा पहला पदस्थापन गया हुआ था, जो गया हुआ पदस्थापन ही था। गया के विषय में प्रचलित है कि वहाँ की नदी में पानी नहीं, पहाड़ों पर पेड़ नहीं और आदमी में माथा नहीं। पहले दो तो स्पष्ट ही दिख जाते हैं, तीसरे के लिए कुछ वक़्त गया में बिताना पड़ता है। ABC बैंक की AC बिगड़ी हुई थी, संस्कृति सुधार की सीमाओं को लाँघकर बिगड़ी हुई थीं और ऐसे में यह ख्याल कि फ़ैज़ ने यह शेर ABC बैंक वालों को ही ध्यान में रखकर लिखा होगा सहसा मन मे आ ही जाता है। दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दिया तुझ से भी दिल–फ़रेब हैं ग़म रोज़गार के कहने को दो शिफ़्ट लगती थी पर हम सुबह 8 से शाम 8 तक कैश काउंटर चलाते थे। फुर्सत साँस लेने की भी नहीं थी, लेकिन जीवन का प्रस्फुरण आदर्श परिस्थितियों का मोहताज नहीं होता। इश्क़ के अंकुर निकले और वे भी वहाँ जहाँ इसकी संभावना सबसे कम थी। यह मेरे जीवन का सबसे सेक्युलर काल था और इस काल में मैं हिन्दू-मुसलमान में परस्पर वैवाहिक संबंधों का जबरदस्त पक्षधर रहा। कुछ दिनों बाद मैंने अपना ध्यान धार्मिक एकता से हटाकर जातीय एकता पर लगाया। इश्क़ ने स्वयंसेवकों की शाखा से मुझे ऐसा तोड़ा कि मैं न मनुवादी ही रहा, न संघी। ख़ैर, यहाँ मयकशी में मैंने नित नए परचम लहराए। सुबह 6 बजे तक पीते रहने के बाद पौने 8 बजे शाखा में उपस्थित होने से लेकर, शाम 8 बजे से रात 11 बजे तक शाखा में पीने तक, सब कुछ किया गया। इस काल में मुझे ज्ञात हुआ कि भारतीय स्त्रियों को शराब से कुछ विशेष बैर है। यह ज्ञान आते-आते जीवन में 28 पतझड़ बीत चुके थे। इस तरफ़ बहार शायद आई ही नहीं या आई भी तो बिना मुझसे मिले चली गई। अकबर इलाहाबादी का यह शेर पढ़ते हुए वक़्त कट रहा था वो गुल हूँ ख़िज़ाँ ने जिसे बर्बाद किया है उलझूँ किसी दामन से मैं वो ख़ार नहीं हूँ और तब तक शाखा प्रबंधक के पद पर प्रोन्नति के साथ पदस्थापना का पत्र मिला। अब लगने लगा कि बस-अंत ही नहीं होता, बसन्त भी होता है। क्रमशः… ************************************************************************ Readers These
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