मासूम और बाग़ी ख़यालातों का मक़बूल और मशहूर शायर , जॉन एलिया - pravasisamwad
August 21, 2021
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मासूम और बाग़ी ख़यालातों का मक़बूल और मशहूर शायर , जॉन एलिया

एलिया साहब की शायरी के कई आयाम हैं , एक तरफ़ तो उसमें तज़ाद कूट कूट कर भरा है – मिसाल के तौर पर वो एक जगह ये कहते हैं –
“कोई मुझ तक पहुँच नहीं पाता
इतना आसान है पता मेरा ! “

उत्तर प्रदेश का अमरोहा शहर , उनकी धड़कनों में ताउम्र धड़कता रहा , भले ही वो पाकिस्तान में रहे, पनपे और वहीं दफ़न हो गये। उस अज़ीम शायर ने खुद का ता’र्रूफ़ अपने लफ़्ज़ों में कुछ यूँ कराया –
“शायर तो दो हैं , “ मीर तक़ी “ और “ मीर जॉन “
बाक़ी तो जो हैं शामो – सहर , ख़ैरियत से हैं .. “

बात निकली है जॉन एलिया की ! उर्दू के शायरों में खुद के और अपनी शायरी के बारे में बताने का खूब रिवाज़ है , जैसा कि ग़ालिब से लेकर जिगर मुरादाबादी तक ने किया है । ग़ालिब ने कहा है –
“हैं और भी दुनिया में सुख़नवर बहुत अच्छे
कहते हैं कि ग़ालिब का है अन्दाज़-ए- बयाँ और ..”

जॉन एलिया को जितना सराहा गया है उतनी ही उनकी आलोचना भी की गयी है। एक तरफ़ उनके आलोचकों का कहना है की जॉन का ख़ुद को मीर के बराबर का समझना आत्म्श्लाघा मात्र है , उनकी शायरी में गहरायी नहीं है । पर ये सब मानते हैं की उनका क्राफ़्ट बेजोड़ है । उनके अशआरों के मानी से बढ़कर उनकी imagery हुआ करती है । जॉन एक ऐसे शायर रहे हैं जो “ख़ून थूकते “ हैं। दूसरी तरफ़ कुछ तनक़ीद निग़ारों का मानना है की उन्हें सिर्फ़ एक रूमानी शायर समझना सही नहीं होगा क्योंकि उनकी शायरी में फ़लसफ़ा भी भरपूर है –

“इतना ख़ाली था अंदारूँ मेरा
कुछ दिनों तक ख़ुदा रहा मुझ में .. “
ग़ालिब और मीर का रंग भी उनकी शायरी में देखने को मिलता है ।

शायरों के लिए शेर पढ़ने का हुनर , आवाज़ का शऊर और अन्दाज़ बहुत मायने रखता है और जॉन के चाहने वाले ये मानते हैं की उनका अन्दाज़ ग़ज़ब का था । जॉन के अंदर का शायर इतना ईमानदार था कि वो अपने आप को महफ़िलों और मुशायरों में बेनक़ाब कर देता –
“क्या मिल गया ज़मीर-ए-हुनर बेच कर मुझे
इतना की सिर्फ़ काम चला रहा हूँ मैं “..
कई दफ़ा जॉन शेर पढ़ते पढ़ते उठ के चल देते थे , रो देते थे , परेशान हो जाते थे , उनकी बेचैनी उनके लहज़े से छलकने लगती थी ।
उनका बाग़ियाना रवैया उनके शेरों से खूब झलकता है और इस लिए आज भी नौजवानों के बड़े पसंदीदा शायर हैं । मीर और ग़ालिब उन्हें याद हों ना हों पर जॉन एलिया उन्हें याद हैं । उनकी कितने शेर इतनी सादगी से कहे गए हैं कि लगता है जैसे बातचीत के लहज़े में कहे गए शेर हों –
“तू अगर आइयो तो जाइयो मत …
जा रहे हो तो जाओ
मगर अपनी याद दिलाइयो मत ! “

एलिया साहब की शायरी के कई आयाम हैं , एक तरफ़ तो उसमें तज़ाद कूट कूट कर भरा है – मिसाल के तौर पर वो एक जगह ये कहते हैं –
“कोई मुझ तक पहुँच नहीं पाता
इतना आसान है पता मेरा ! “
या फिर –
“एक ही फ़न तो हमने सीखा है
जिससे मिलिए उसे ख़फ़ा कीजे ..
मिलते रहिए इसी तपाक के साथ
बेवफ़ाई की इंतहा कीजे ..”
दूसरी तरफ़ इनकी तंज़निगाही का जोड़ नहीं । अशआर
देखिए –
“गाहे गाहे अब यही हो क्या
तुमसे मिल कर ख़ुशी हो क्या !

बहुत दिल को कुशादा कर लिया
ज़माने भर से वादा कर लिया क्या ? “

सादगी और मासूमियत जिसे देता है ख़ुदा ही देता है , क्योंकि ये जितनी आसान दिखती है उतनी होती नहीं । जॉन एलिया की शायरी बड़ी आसानी से उन सारे सच जो उगलती है जिसे इंसान चेहरे पे चेहरा डाले छुपाते चलता है ! इंसानी एहसासात के सच महफ़िल में यूँ अपने शेरों के हवाले से उगलते थे कि सुनने वालों के सीने में एक कसक सी उठती की अरे इसने मेरी बात कह दी ! अपने अंदर कई झूठे चेहरे लिए लोग चलते हैं , पर जिस तरह वो खुद के सच को बेनक़ाब करते थे , वहाँ यही लगता है की ये शायर कितनी मासूम शख़्सियत रखता था.. आपको यूँ ही लगेगा की कटाक्ष और मासूमियत जैसी दो तलवारें जॉन के म्यान में साथ साथ चलती हैं ।

“इतना ख़ाली था अंदारूँ मेरा
कुछ दिनों तक ख़ुदा रहा मुझ में .. “

शायर यूँ तो बड़े तुनुकमिज़ाज होते हैं , वैसे ही जॉन भी थे , पर उनके अशआरों में एक अजीब दुनियादारी की समझ – बूझ झलकती है , जब वो कहते हैं –
“नया एक रिश्ता क्यों पैदा करें हम
जब बिछड़ना है तो झगड़ा क्यों करें हम “
वसीम बरेलवी उनके समकालीन शायर रहे हैं और कुछ जॉन की शायरी से मिलते जुलते रंग उनकी शायरी में भी है –
“मायूस एक मुझी को तो कर नहीं जाता
वो मुझसे रूठ के अपने भी घर नहीं जाता .. “
फ़ैज़ , जोश , इक़बाल साजिद जैसे समकालीन शायरों के बीच उनका अपना एक अन्दाज़ था , एक अजब अन्दाज़- ए – गुफ़्तगू !

अनवर शाऊर पाकिस्तान में जॉन के समकालीन शायर थे , उन्होंने कहा है कि वो अपने शेर बरजस्ता बोला करते थे , और कई बार उन्होंने उनके कहे हुए को लिपिबद्ध भी किया । जॉन एलिया ने उन तमाम ख़यालातों को ज़ुबान दिया जिसे आम तौर पर लोग ज़ाहिर नहीं करते !

एक ज़माने में पाकिस्तान में उर्दू डायजेस्ट की धूम रहती थी ।जॉन साहब सबरंग डायजेस्ट के लिए काम करते थे । इंशा नाम के एक इल्मी रिसाले के लिए भी उन्होंने काम किया । वो कहते थे की शायरी कुल – वक़्ती काम है , और सिवा उसके उनसे कुछ किया भी नहीं गया । ज़ाहिरा हिना से निकाह कर के वो घरजमाई बन कर रहे और घर चलाने की फ़िक्र कभी की ही नहीं ।बहुत साल साथ रहने के बाद वो दोनो रज़ामंदी से जुदा हुए और इस जुदाई के बाद जॉन साहब ने जाना की उन्होंने क्या खोया । ख़ुद के बारे में उन्होंने कहा है –

“मैं भी बहुत अजीब हूँ ,
इतना अजीब के बस
ख़ुद को तबाह कर किया
और मलाल भी नहीं …. “
जॉन ज़्यादातर खुश नहीं रहते थे और जो भी उनके साथ होता उसे ग़मज़दा कर देते थे ।

अमरोहा शहर और बान नदी में उनकी जान बसी थी कुछ इस तरह की पाकिस्तान जा कर भी वो उसे कुछ यूँ याद करते थे –
“मीर दिल्ली से निकले , गए लखनऊ
हम कहाँ जाएँगे , तुम कहाँ जाओगे “
एक बार जब जॉन हिंदुस्तान आए तो मुशायरे में लोगों ने उन्हें खूब सराहा। उनकी इज़्ज़त अफ़जायी की तो उन्होंने एक शेर कहा –
“मिल कर तपाक से न हमें कीजिए उदास
ख़ातिर न कीजिए, कभी हम भी यहाँ के थे “

उनके बेसाख़्ता फ़िकरे , उनके तंज़ , उनकी मासूमियत और उनकी ईमानदारी- सब इतने मुखर रंग थे की उनसे बातें करते हुए लोग ये महसूस करते थे कि हर पाँच मिनट बाद वो एक मुख़्तलिफ़ आदमी हुआ करते थे । अहमद जावेद जो पाकिस्तान के एक नामचीन तनक़ीदनिग़ार हैं , कहते हैं कि शायर दो तरह के होते हैं , और उनमें से एक तरह के वैसे , जिनकी शायरी को समझने के लिए उनकी शख़्सियत जो समझना बेहद ज़रूरी हो जाता है और जॉन साहब की शायरी को समझने के लिए उनकी शख़्सियत को समझना बहुत ज़रूरी है। एलिया साहब का अन्दाज़ ऐसा है कि जैसे कोई आग की ज़मीन पर मोम के पुतले बना रहा हो , जैसे कोई रेत के दरिया से मोती निकाल रहा हो … !

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