कल्पना कीजिए—चेन्नई के शोर-शराबे से दूर, समुद्र की हवा में घुली रचनात्मकता, जहाँ कैनवास, हथकरघा और मूर्तियाँ साथ-साथ साँस लेती हैं। एक ऐसा गाँव, जिसे कलाकारों ने सिर्फ बसाया नहीं, बल्कि जिया। यही है चोलामंडल कलाकार ग्राम—भारत का पहला कलाकारों का सामूहिक निवास, जहाँ कला दीवारों तक सीमित नहीं रही, बल्कि जीवन का हिस्सा बन गई।
यह कहानी केवल चित्रों और मूर्तियों की नहीं है, बल्कि संघर्ष, नवाचार और आत्मनिर्भरता की है—जहाँ कलाकारों ने फूस की छतों के नीचे अपने सपनों को आकार दिया और बैटिक साड़ियों के ज़रिये अपनी कला को दुनिया तक पहुँचाया। मद्रास आर्ट मूवमेंट की गोद में पली यह बस्ती आज भी भारतीय कला के इतिहास की सबसे जीवंत और प्रेरक दास्तानों में से एक है।

उत्पत्ति (Origin)
लगभग 60 वर्ष पहले, समुद्र के किनारे कैसुरीना के पेड़ों से घिरी रेत की एक शांत पट्टी उभरते कलाकारों के लिए आश्रय स्थल बन गई। इसे नाम दिया गया चोलामंडल ग्राम, जो कला और स्वदेशी रचनात्मकता का संगम बन गया। प्रसिद्ध कलाकार के.सी.एस. पाणिकर के नेतृत्व में 1966 में 10 एकड़ भूमि पर इस कलाकार समुदाय की स्थापना हुई, जहाँ 30 से अधिक कलाकारों ने न केवल काम किया, बल्कि अपने घर भी स्वयं बनाए।

‘ऑल आर्टिस्ट्स विलेज’ का विचार एक कक्षा चर्चा के दौरान सामने आया, जब उस समय के गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ आर्ट्स के प्राचार्य पाणिकर ने अपने छात्रों को कला के माध्यम से आय के वैकल्पिक रास्ते खोजने की सलाह दी। अवसरों की कमी के कारण कई पारंपरिक और अमूर्त कला में प्रशिक्षित छात्र स्नातक होने के बाद आजीविका के लिए संघर्ष कर रहे थे। परिस्थितियाँ कठिन थीं, लेकिन पाणिकर ने इन चुनौतियों को समझते हुए आशा का मार्ग दिखाया।
इस महान कलाकार का मानना था कि कमजोर नौकरी बाजार और पश्चिमी प्रभाव के बीच भारतीय कला की जीवंतता फीकी नहीं पड़नी चाहिए। उन्होंने छात्रों को सामूहिक रूप से काम करने और अपनी रचनाओं के लिए स्वदेशी प्रेरणाओं की ओर लौटने का सुझाव दिया, ताकि आधुनिक दृष्टिकोण के साथ एक मजबूत भारतीय पहचान स्थापित की जा सके।
1965 में आयोजित एक प्रदर्शनी से पहला बड़ा कदम उठा, जिससे उस समय लगभग ₹50,000 की राशि एकत्र हुई। इस सफलता के बाद तय किया गया कि आय का 10 प्रतिशत एक साझा रहने और काम करने की जगह के निर्माण में लगाया जाएगा। इसी निर्णय से चोलामंडल कलाकार ग्राम का जन्म हुआ। उस समय इंजंबक्कम एक मछुआरा बस्ती थी, जहाँ कलाकारों के इस सामूहिक जीवन की नींव रखी गई।
फूस की झोपड़ियों से एम्फीथिएटर तक: आकर्षण
शुरुआती सात कलाकारों ने रहने और काम करने के लिए फूस की झोपड़ियाँ बनाई थीं। धीरे-धीरे संस्थापक सदस्यों की संख्या 7 से बढ़कर 30 हो गई, जिन्हें भारतीय आधुनिक कला के अग्रदूत माना जाता है। आज यह परिसर मूर्तिकला उद्यान और अतीत की झलक लिए विविध कलात्मक रचनाओं से सजा हुआ है। कांस्य, लकड़ी और ग्रेनाइट से बनी कलाकृतियाँ अपनी बारीक कारीगरी और उत्कृष्टता के लिए जानी जाती हैं।
समय के साथ ग्राम में एक ओपन-एयर थिएटर, पुस्तकालय, क्राफ्ट शॉप और रेस्तरां जैसी आधुनिक सुविधाएँ भी विकसित हुई हैं। यहाँ पारंपरिक से लेकर अमूर्त शैली तक की उत्कृष्ट कलाकृतियाँ देखने को मिलती हैं।

ओपन-एयर थिएटर में होने वाली सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ कला प्रेमियों के लिए विशेष आकर्षण हैं। यह स्थान कविता पाठ और साहित्यिक गोष्ठियों के लिए भी उपयोग में लाया जाता है। इसके अलावा, दो प्रमुख दीर्घाएँ—एच.के. केजरीवाल विंग में लैबर्नम और तुलस्यन विंग में इंडिगो—चोलामंडल कलाकारों के कार्यों और मद्रास आर्ट मूवमेंट में उनके योगदान को समर्पित हैं। यहाँ एक अंतरराष्ट्रीय मूर्तिकला पार्क, अतिथि गृह और अतिथि कलाकारों के लिए स्टूडियो भी हैं।
आगे की राह (The Way Forward)
मई 2023 तक, 30 संस्थापक सदस्यों में से केवल 12 जीवित हैं, जिनमें से मात्र पाँच ही अब भी ग्राम में रहते हैं। समय के साथ, गैर-कलाकार निवासियों के बढ़ने से गाँव का स्वरूप बदल रहा है। फूस की झोपड़ियाँ आधुनिक इमारतों में तब्दील हो चुकी हैं और शहरीकरण के कारण अतीत की केवल कुछ झलकियाँ ही शेष हैं।
फिर भी, इन क्रांतिकारी कलाकारों का उत्साह कम नहीं हुआ है। वे समय के साथ विकसित होने में विश्वास रखते हैं, लेकिन चोलामंडल की मूल आत्मा—एक अनोखे कलाकार ग्राम के रूप में भारतीय कला आंदोलन में उसके योगदान—को अपने दिल में संजोए हुए हैं।







