परंपरा से रंगी दीवारें - pravasisamwad
February 28, 2026
19 mins read

परंपरा से रंगी दीवारें

सिरिवंते गाँव में भोर की पहली किरण के साथ, जब मानसून के बादल मलनाड की पन्ना-सी हरी पहाड़ियों पर झुके रहते हैं, 22 वर्षीय भावना प्राकृतिक रेशों से बने पतले ब्रश को चावल के घोल से भरे कटोरे में डुबोती है। उसके सामने की मिट्टी की दीवार पहले ही लाल गेरू से लीपी जा चुकी है। स्थिर हाथों से वह सफेद रंग की महीन रेखाएँ उकेरना शुरू करती है — कहीं ‘कलसा’, तो कहीं ‘नीली’। हर रेखा स्मृति, परंपरा और श्रद्धा से निर्देशित है। कुछ ही घंटों में इस घर में विवाह का उत्सव शुरू होगा। लेकिन मेहमानों के आने से पहले दीवारों को बोलना है।

यह सजावट नहीं है। यह विरासत है।

मलनाड के हरे-भरे, वर्षा-स्नात परिदृश्यों में, जहाँ घने जंगलों और लहराती पहाड़ियों के बीच मानसून की मधुर ध्वनि गूंजती है, वहाँ कला के माध्यम से परंपरा आज भी जीवित है। आधुनिकता भले ही धीरे-धीरे ग्रामीण कर्नाटक का स्वरूप बदल रही हो, लेकिन इस क्षेत्र के लोगों ने अपने सांस्कृतिक खजाने को दृढ़ निश्चय के साथ संजोकर रखा है। इस विरासत की सबसे सशक्त अभिव्यक्तियों में से एक है ‘हसे चित्तारा’ — एक पारंपरिक लोक कला, जो साधारण दीवारों को पवित्र कथाओं में बदल देती है और प्रकृति, आस्था तथा सामुदायिक जीवन की लय का उत्सव मनाती है।

दीवरू समुदाय में गहराई से रची-बसी हसे चित्तारा, मलनाड की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न हिस्सा रही है। शिवमोग्गा जिले के सागर और सोराब तालुकों या उत्तर कन्नड़ जिले के सिद्धापुर तालुक के गाँवों में चलते हुए दीवारों, दरवाजों की चौखटों और आँगनों पर उकेरी गई ज्यामितीय सटीकता और प्रतीकात्मक सुंदरता सहज ही दिखाई देती है। जटिल रेखाओं और आकृतियों के माध्यम से मलनाड का दैनिक जीवन कला का रूप ले लेता है।

जो कला कभी कुछ तालुकों तक सीमित थी, वह आज गाँव की गलियों से निकलकर शहरी कर्नाटक तक पहुँच चुकी है। क्षेत्रीय कलाकारों के समर्पण के कारण हसे चित्तारा अब बेंगलुरु के रेलवे स्टेशनों, सभागारों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों सहित राज्य के कई हिस्सों में दिखाई देती है। एक सामुदायिक परंपरा आज क्षेत्रीय गौरव का प्रतीक बन चुकी है।

यह कला प्रतीकों से समृद्ध है। ज्यामितीय पैटर्न और सूक्ष्म डिजाइनों से बनी हसे चित्तारा प्रकृति के तत्वों को दर्शाती है और समुदाय की धार्मिक, सामाजिक तथा कृषि संबंधी परंपराओं को अभिव्यक्त करती है। इसके लिए उपयोग की जाने वाली सामग्री भी प्रकृति से ही ली जाती है। ब्रश प्राकृतिक रेशों से बनाए जाते हैं, और रंग पारंपरिक तरीकों से तैयार किए जाते हैं, जो पीढ़ियों से चले आ रहे हैं।

सिरिवंते गाँव में युवाओं को हसे चित्तारा सिखाने वाले चंद्रशेखर एन कहते हैं, “यह कहना कठिन है कि यह कला कितनी पुरानी है। माना जाता है कि यह लगभग 2,000 वर्ष पुरानी है। इसे पारंपरिक रूप से विवाह, गृहप्रवेश और त्योहारों जैसे शुभ अवसरों पर बनाया जाता है।”

उनके अनुसार, हसे चित्तारा में 97 प्रकार के मोटिफ़ हैं, जिनमें से 77 की पहचान कर उन्हें नाम दिए गए हैं — जैसे ‘एले’, ‘नीली’, ‘नीली कोच्चु’, ‘बसिंगा नीली’, ‘गोम्बे सालु’ और ‘कलसा’। प्रत्येक आकृति का अपना अर्थ है, जो इस क्षेत्र की सांस्कृतिक स्मृति में गुंथा हुआ है।

प्रसिद्ध कन्नड़ साहित्यकार ना डी’सूज़ा, जिन्होंने चित्तारा नामक पुस्तक लिखी है, बताते हैं कि ‘चित्तारा’ का अर्थ है चित्रकला और ‘हसे’ का अर्थ है अवसर। वे विवाह की एक रस्म का उदाहरण देते हैं — समारोह के दौरान दूल्हा-दुल्हन पारंपरिक वेशभूषा में भुने हुए पापड़ के ऊपर रखी नौ परतों वाली चटाई पर बैठते हैं। उनके बैठते ही पापड़ टूटने की आवाज़ आती है, जिससे मेहमान हँस पड़ते हैं और दुल्हन लजा जाती है। इसी क्षण को ‘हसे’ कहा जाता है। इस अवसर से संबंधित चित्र, जिसमें प्रायः भगवान शिव और पार्वती का चित्रण होता है — और कभी-कभी वर-वधू के नाम भी लिखे जाते हैं — दीवार पर बनाया जाता है। यही है हसे चित्तारा।

यह कला केवल विवाह तक सीमित नहीं है। पूर्णिमा के त्योहार ‘भूमि हुन्निमे’ के अवसर पर टोकरियों पर भी चित्तारा बनाई जाती है। पहले गाँव की महिलाएँ ज़मीन पर रंगोली नहीं बनाती थीं क्योंकि पशु उसे मिटा देते थे। इसलिए उन्होंने दीवारों को ही स्थायी कैनवास बना लिया।

परंपरागत रूप से केवल तीन रंगों का उपयोग होता है। सफेद रंग चावल को चार-पाँच दिनों तक भिगोकर और पीसकर बनाया जाता है। लाल रंग प्राकृतिक गेरू से प्राप्त होता है, और काला रंग चावल को भूनकर तैयार किया जाता है। दीवार पर लाल गेरू की पृष्ठभूमि बनाई जाती है, जिस पर सफेद और काले रंग से आकृतियाँ उकेरी जाती हैं। प्राकृतिक रंगों से बनी हसे चित्तारा लगभग तीन वर्षों तक टिक सकती है। आज कुछ कलाकार अधिक स्थायित्व के लिए एक्रिलिक रंगों का भी उपयोग करते हैं, लेकिन मूल भावना को बनाए रखते हैं।

चंद्रशेखर और उनकी पत्नी गौरम्मा जैसे कलाकार हसे चित्तारा को भारत से बाहर भी ले गए हैं। उन्होंने इसे जापान और यूएई जैसे देशों में प्रदर्शित किया है। गौरम्मा ने यह कला अपनी माँ और बहन से सीखी, जो गाँव में दीवारों और टोकरियों पर इसे बनाती थीं। जो कभी घरेलू परंपरा थी, वह अब अंतरराष्ट्रीय पहचान पा रही है।

खुशी की बात है कि क्षेत्र के कई युवा — लड़के और लड़कियाँ — इस कला को सीखने में रुचि दिखा रहे हैं। भावना जैसी युवा इसे अपनी पहचान और जिम्मेदारी दोनों मानती है। वह कहती है, “यदि हम इसे सीखें और अगली पीढ़ी को सिखाएँ, तो हम इस कला को लुप्त होने से बचा सकते हैं।”

हालाँकि इसकी तुलना अक्सर महाराष्ट्र की ‘वारली’ कला से की जाती है, लेकिन हसे चित्तारा अपनी शैली, संदर्भ और प्रतीकों में विशिष्ट है। फिर भी, वारली कला को जहाँ संस्थागत समर्थन मिला है, वहीं हसे चित्तारा अब भी व्यापक सरकारी संरक्षण की प्रतीक्षा में है। सांस्कृतिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस धरोहर को संरक्षित और प्रोत्साहित करने के लिए ठोस प्रयासों की आवश्यकता है।

परंपरागत रूप से दीवारों, टोकरियों और मटकों पर बनाई जाने वाली हसे चित्तारा आज नए रूपों में भी दिखाई देती है। अब इसे कपड़ों, पेन होल्डरों, सजावटी डिब्बों और अन्य हस्तशिल्प वस्तुओं पर भी उकेरा जा रहा है। चित्तारा से सजे कपड़े शहरी घरों की दीवारों पर लगाए जा सकते हैं, और रोजमर्रा की वस्तुओं में यह मलनाड की परंपरा की झलक ले आती है। उद्देश्य स्पष्ट है — नई पीढ़ी इस कला से जुड़ाव महसूस करे, उसे महत्व दे और संरक्षित रखे।

सदियों तक हसे चित्तारा की प्रमुख संरक्षक महिलाएँ रही हैं। विशेषकर विवाह के अवसर पर केवल दूल्हा या दुल्हन की बहनें ही चित्तारा बना सकती हैं — उनकी माँ या बुआ नहीं। युवा महिलाएँ विवाह से चार-पाँच महीने पहले इसकी तैयारी शुरू कर देती हैं। यद्यपि अब पुरुष भी इस कला को सीख रहे हैं और संरक्षित कर रहे हैं, इसकी नींव आज भी महिलाओं की सृजनशीलता और सांस्कृतिक जिम्मेदारी पर टिकी है।

जब भावना दीवार से थोड़ा पीछे हटती है, तो लाल मिट्टी की पृष्ठभूमि पर उकेरी गई आकृतियाँ हल्की रोशनी में चमक उठती हैं। जल्द ही घर में हँसी, रस्में और उत्सव की गूँज भर जाएगी। लेकिन विवाह गीतों के थम जाने के बाद भी चित्तारा वहीं रहेगी — शांत, साक्षी और स्थायी।

सफेद, लाल और काले रंगों की रेखाओं में हसे चित्तारा केवल दीवारों को नहीं सजाती। वह मलनाड की आत्मा को संजोकर रखती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Previous Story

पिचवाई की शाश्वत सुंदरता: एक पवित्र कला का पुनर्पाठ

Next Story

कावी कला: लाल रंग में उकेरी गई गोवा की प्राचीन कथाएँ

Latest from Blog

Pravasi Short News 15.04.26

Indian diaspora’s global rise meets visa curbs, travel disruptions and identity churn India’s 35-million-strong diaspora is gaining economic and strategic

Pravasi Daily News 15.04.2026

Indian Diaspora Organisations Launch New Global Networking Platformshttps://pravasisamwad.com/indian-diaspora-organisations-launch-new-global-networking-platforms/ Portugal Continues to Attract Indian Digital Nomads with Flexible Visa Policieshttps://pravasisamwad.com/portugal-continues-to-attract-indian-digital-nomads-with-flexible-visa-policies/ Malaysia
Go toTop