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विविध - Page 10

दास्तान-ए-इश्क़ भाग #6

इश्क़ के अंकुर निकले और वे भी वहाँ जहाँ इसकी संभावना सबसे कम थी। यह मेरे जीवन का सबसे सेक्युलर काल था PRAVASISAMWAD.COM मेरा पहला पदस्थापन गया हुआ था, जो गया हुआ पदस्थापन ही था। गया के विषय में प्रचलित है कि वहाँ की नदी में पानी नहीं, पहाड़ों पर पेड़ नहीं और आदमी में माथा नहीं। पहले दो तो स्पष्ट ही दिख जाते हैं, तीसरे के लिए कुछ वक़्त गया में बिताना पड़ता है। ABC बैंक की AC बिगड़ी हुई थी, संस्कृति सुधार की सीमाओं को लाँघकर बिगड़ी हुई थीं और ऐसे में यह ख्याल कि फ़ैज़ ने यह शेर ABC बैंक वालों को ही ध्यान में रखकर लिखा होगा सहसा मन मे आ ही जाता है। दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दिया तुझ से भी दिल–फ़रेब हैं ग़म रोज़गार के कहने को दो शिफ़्ट लगती थी पर हम सुबह 8 से शाम 8 तक कैश काउंटर चलाते थे। फुर्सत साँस लेने की भी नहीं थी, लेकिन जीवन का प्रस्फुरण आदर्श परिस्थितियों का मोहताज नहीं होता। इश्क़ के अंकुर निकले और वे भी वहाँ जहाँ इसकी संभावना सबसे कम थी। यह मेरे जीवन का सबसे सेक्युलर काल था और इस काल में मैं हिन्दू-मुसलमान में परस्पर वैवाहिक संबंधों का जबरदस्त पक्षधर रहा। कुछ दिनों बाद मैंने अपना ध्यान धार्मिक एकता से हटाकर जातीय एकता पर लगाया। इश्क़ ने स्वयंसेवकों की शाखा से मुझे ऐसा तोड़ा कि मैं न मनुवादी ही रहा, न संघी। ख़ैर, यहाँ मयकशी में मैंने नित नए परचम लहराए। सुबह 6 बजे तक पीते रहने के बाद पौने 8 बजे शाखा में उपस्थित होने से लेकर, शाम 8 बजे से रात 11 बजे तक शाखा में पीने तक, सब कुछ किया गया। इस काल में मुझे ज्ञात हुआ कि भारतीय स्त्रियों को शराब से कुछ विशेष बैर है। यह ज्ञान आते-आते जीवन में 28 पतझड़ बीत चुके थे। इस तरफ़ बहार शायद आई ही नहीं या आई भी तो बिना मुझसे मिले चली गई। अकबर इलाहाबादी का यह शेर पढ़ते हुए वक़्त कट रहा था वो गुल हूँ ख़िज़ाँ ने जिसे बर्बाद किया है उलझूँ किसी दामन से मैं वो ख़ार नहीं हूँ और तब तक शाखा प्रबंधक के पद पर प्रोन्नति के साथ पदस्थापना का पत्र मिला। अब लगने लगा कि बस-अंत ही नहीं होता, बसन्त भी होता है। क्रमशः… ************************************************************************ Readers These

योग के आयाम: आधुनिक परिप्रेक्ष्य में योग का स्वरूप

योग सम्पूर्ण व्यक्तित्व के रुपांतरण की प्रक्रिया है जो कहने , सुनने अथवा देखने की नहीं अपितु अनुभूति की अभिव्यक्ति है । यह मात्र आसन , प्राणायाम नहीं बल्कि जीवन जीने की कला है । इसकी अभिव्यक्ति हमारे व्यवहार में तब होने लगती है जब यह हमारी दिनचर्या में हर पल रच बस जाती है । इस अभिव्यक्ति का मुख्य आधार  “यम” एवं “नियम” है जो यौगिक जीवन की पहली सीढ़ी है, जिस पर पहला कदम संकल्प के सहारे बढ़ाया जा सकता है । संकल्प का बीजारोपण श्रद्धा और विश्वास से होता है , अपने कर्म के प्रति , अपने ईष्ट के प्रति तथा अपने गुरु के प्रति । जिस प्रकार एक किसान जमीन के टुकड़े की जुताई करता है , उसमें से कंकड़ , पत्थर और मोथों को निकाल कर नरम बनाता है , फिर खाद , पानी डालकर बीज बोने के लिए खेत तैयार करता है उसी प्रकार ” यम और नियम ” भी हमारे व्यवहार में आने वाले नकारात्मक प्रवृतियों को समायोजित करने के साधन हैं। योग के ज्योत की अलख श्री स्वामी शिवानंद जी ने जलाई ‌जिसको उनके परम प्रिय शिष्य श्री स्वामी सत्यानंद जी ने विज्ञान की कसौटी पर कस कर घर – घर ही नहीं अपितु देश विदेशों में भी पहुंचाया । इसी परंपरा को आगे कायम रखते हुए उनके एकमात्र परम प्रिय शिष्य श्री स्वामी निरंजनानंद सरस्वती जी ने जो ” बिहार योग विद्यालय ” के परम आचार्य एवं संचालक हैं , आधुनिक परिवेश को देखते हुए जीवन शैली के रूप में सर्व सुलभ कराने का प्रयास जारी रखा है । मानवजाति की मानसिकता में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए यम एवं नियम को साधने की आवश्यकता है , जिसे मन को संयमित करके ही संभव है । मन का स्वभाव बच्चे की भांति चंचल है जिसको बल पूर्वक संयमित नहीं किया जा सकता , इसे मैत्री भाव से अनुशासित किया जा सकता है ।मन को अनुशासित करके ही इन्द्रियों को नियंत्रित करने का प्रयास किया जा सकता है । आधुनिक सामाजिक परिवेश को देखते हुए स्वामी जी ने यम और नियम के नूतन आयामों को प्रतिपादित किया है , जैसे यम — अर्थात — प्रसन्नता , क्षमा , इन्द्रिय निग्रह ……आदि नियम — अर्थात — जप , नमस्कार ( विनम्रता ) , मनोनिग्रह ….. आदि ये सभी हमारी दिनचर्या के पहलू हैं जो ठीक वैसे ही एक दूसरे से अनुगुंठित हैं जैसे माला में मोती और धागा । समय के भागते हुए रफ्तार को देखते हुए स्वामी निरंजनानंद सरस्वती जी ने  यम एवं नियम के व्यवहारिक पक्षों की खोज की है और उसके छोटे से छोटे किन्तु महत्वपूर्ण पहलुओं को चलते फिरते अपनाने का मार्ग बतलाया है । —   सं. योगप्रिया (मीना लाल ) ************************************************************************ Readers These are extraordinary times. All of us

दास्तान-ए-इश्क़ भाग # 5

सभी कृष्ण सुदामा से प्रेम नहीं करते, प्रायः नहीं करते।जो कमजोर दिखता है, उसको कुचलने की कोशिश की जाती है PRAVASISAMWAD.COM नौकरी मिल गई और अब मन थोड़ा निश्चिंत हुआ। रोटी की चिंता दूर होने पर चाँद को देखने

दास्तान-ए-इश्क़ भाग # 3

अब स्नातक पूरा होने को था, नौकरी मिलने की कोई संभावना नहीं थी और अपने विषय से मेरा कोई सरोकार नहीं था ऐसे में मैंने अपना भविष्य सुरक्षित रखने के लिए (नाकारा घोषित होने को तत्काल स्थगित रखने के लिए) प्रयोजनमूलक हिन्दी (पत्रकारिता) में दाखिला लिया PRAVASISAMWAD.COM स्नातक में मेरा विषय सांख्यिकी प्रतिष्ठा थी, जिसने एक छात्र के रूप में मेरी प्रतिष्ठा काफी कम की

दास्तान-ए-इश्क़ भाग # 4

एक मध्यम वर्गीय भारतीय की निष्ठा इश्क़ से रोटी की ओर घूम जाती है। वह हुस्न-ओ-सुख़न की शायरी छोड़कर धूमिल-मुक्तिबोध को पढ़ने लगता है PRAVASISAMWAD.COM जब उम्र 25 पर पहुँच रही हो और नौकरी न मिले, तो एक मध्यम वर्गीय भारतीय की निष्ठा इश्क़ से रोटी की ओर घूम जाती है। वह हुस्न-ओ-सुख़न की शायरी छोड़कर धूमिल-मुक्तिबोध को पढ़ने लगता है। एक इश्क़ ही इलाज़ ग़म-ए-ज़िन्दगी नहीं दुनिया में और भी हैं तकाज़े हयात के पढ़ता हुआ रोटी की चिंता करने लगता है। पत्रकारिता से परास्नातक करने के बाद नौकरी (मन लायक) न मिलने की स्थिति में फिर प्रबंध-शास्त्र से परास्नातक (MBA) करने का निर्णय लिया। बिल्ली(CAT) को घंटी बाँधने की कोशिश की लेकिन शिकार से पहले की रात हिम्मत और उत्साह बढ़ाने में कुछ ज्यादा ही शराब पी ली। अंग्रेजी में एक कहावत है कि जितना आप युद्धभ्यास में पसीना बहाते हैं, रणक्षेत्र में रक्त उतना ही कम बहता है। मेरे साथ उल्टा हुआ, मैं रणभूमि में क्षत-विक्षत हो गया। लेकिन गिरते-पड़ते मेरा दाखिला काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रबंधशास्त्र संकाय में हो ही गया। इस विश्वविद्यालय में आते ही हम फिर से पुराने रंग में लौटे और ज़िन्दगी फिर से श्याम-श्वेत से ईस्टमैन कलर हो गई। यहाँ रैगिंग की प्रथा थी, जो इंट्रो नाम से चलती थी। मैंने आग्रह किया कि मुझसे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में इंट्रो न माँगा जाए, जिसे थोड़ा हड़काए जाने के बाद मेरे सीनियरों ने सप्रेम मान लिया। उस बैच का दादा कला संकाय का मेरा अनुज था। कला संकाय की भैयारी सगे भाइयों जैसी ही निभती है, सो उसने लाज रखी। इससे मेरी ख्याति (बदनामी) सभी विद्यार्थियों के कानों तक पहुँची। लड़कियाँ के सान्निध्य की मेरी चाह धरी की धरी रह गई। मेरे पानी को भी लोग जिन्न समझ रहे थे और मैं एक बदमाश मशहूर हो गया। बदनाम होने पर नाम तो हुआ पर बदनामी और ख्याति में फ़र्क तो था ही। फिर भी हम कहाँ मानने वाले थे और एक सांवली सलोनी सुरीली कन्या पर मोहित हो गया। वह गाती और मैं मोहित होता। ग़ज़ल मैं पढ़ने के साथ सुनने भी लगा, पर यह सिलसिला भी यहीं तक रहा। उसकी याद में मैं कई दिनों तक रेशमा का गाना लंबी जुदाई सुनता रहा। अब इस जुदाई को भी 13 वर्ष हो गए, और मैंने ग़ज़ल सुनना भी बंद कर दिया। हालत-ए-हाल के सबब हालत-ए-हाल ही गई शौक़ में कुछ नहीं गया शौक़ की ज़िंदगी गई  — जॉन एलिया पढ़ाई पूरी करने से पहले ही कैंपस प्लेसमेंट हुआ और मैं ABC बैंक पहुँच गया। कल जयपुर ट्रेनिंग की कहानी। क्रमशः… ************************************************************************ Readers These

कनेडियन महिला “जलवायु परिवर्तन रोग” से ग्रसित संसार की पहली मरीज!

इन सभी सकारात्मक पहलुओं के बावज़ूद ग्लोबल वार्मिंग यानी वैश्विक तापमान और क्लाइमेट चेंज यानी जलवायु परिवर्तन की समस्या दिनोंदिन

दास्तान-ए-इश्क भाग # 3

जब मैं काशी पहुँचा तब मुझे ज्ञात हुआ कि क्यों एक ब्रह्मचर्य व्रत धारी धनुर्धर काशी नरेश की कन्याओं को हर ले गया था PRAVASISAMWAD.COM सन 2000 में 12वीं की परीक्षा देने के साथ ही काशी हिंदू विश्वविद्यालय में दाखिले की परीक्षा दी।

दास्तान-ए-इश्क़ भाग #2

हम तौबा कर के मर गए बे-मौत ऐ ‘ख़ुमार’ तौहीन-ए-मय-कशी का मज़ा हम से पूछिए   ख़ुमार  अब कुछ यही

दास्तान-ए-इश्क़ भाग # 1

मुझे पहली बार प्यार तब हुआ था, जब मैं बाल्यावस्था से किशोरावस्था की ओर बढ़ रहा था… PRAVASISAMWAD.COM इश्क पर मेरा कुछ कहना उतना ही हास्यास्पद  और  अप्रासंगिक है जितना कि मेरा बालों के रखरखाव के
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