72 वर्षीय सावित्री अम्मा जब अपने ब्रश को रंगों में डुबोती हैं, तो लगता है जैसे वक़्त थम गया हो। बुढ़ापे की रूढ़ियों को पीछे छोड़ते हुए, वह न किसी की मदद की मोहताज हैं और न ही किसी के सहारे जीती हैं। वह हैं एक जीवंत प्रेरणा, जिनकी आंखों में आत्मनिर्भरता की चमक और हाथों में कला की गर्मी है।
श्रीकालहस्ती के एक हॉल में बैठी वह जब एक विशाल कैनवास पर कलमकारी की महीन रेखाएं खींचती हैं, तो वह सिर्फ चित्र नहीं बना रहीं—वह एक परंपरा को फिर से जीवित कर रही हैं। आज, सावित्री अम्मा की कलमकारी कला वॉशिंगटन डी.सी. के जॉर्ज वॉशिंगटन टेक्सटाइल म्यूज़ियम की दुकान में खरीदी जाती है।यह बदलाव अकेले सावित्री अम्मा तक सीमित नहीं है। इन सैकड़ों कहानियों के पीछे एक नाम है—अनीता रेड्डी।
एक महिला, जिसने कला को आंदोलन बनाया
1999 की एक दोपहर, एक बुजुर्ग कलाकार बेंगलुरु में अनीता रेड्डी के दरवाजे पर सहायता की आस लिए आए। उनके फटे हुए चित्रों ने अनीता और उनके पिता द्वारकानाथ रेड्डी के दिल को झकझोर दिया। यहीं से जन्म हुआ—DWARAKA (Development of Women and Rural Artisans for Knowledge and Action)। मक़सद: कलमकारी को पुनर्जीवित करना और महिलाओं को सशक्त बनाना।

आज, यह संस्था 5000 से अधिक महिला कारीगरों को आजीविका ही नहीं, आत्मसम्मान भी दे रही है। द्वारका के बनाए बैग, साड़ियाँ, डायरी और सजावटी वस्तुएं अब भारत ही नहीं, दुनियाभर में सराही जाती हैं।
श्रीकालहस्ती: कला का नया तीर्थ
मंदिरों का शहर श्रीकालहस्ती अब एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण का केंद्र बन गया है। यहाँ कला की हर रेखा में परंपरा है, और हर रंग में आत्मनिर्भरता की छाप।
एक बड़े हॉल में महिलाएं कपड़ों पर बने मोर, पेड़, देवी-देवताओं की आकृतियों को गर्व से प्रदर्शित करती हैं। यहाँ सिर्फ धागे नहीं बुने जाते, यहाँ भविष्य बुना जाता है।
29 वर्षीय कंचना, आज द्वारका की महासचिव हैं। हेमा, चंद्रकला और माधवी जैसी महिलाएं न सिर्फ उत्कृष्ट कलाकार हैं, बल्कि अब दूसरों को प्रशिक्षित कर समुदाय में बदलाव ला रही हैं। “पहले यह कला पुरुषों के बीच सीमित थी,” अनीता कहती हैं, “अब महिलाएं इसका नेतृत्व कर रही हैं।”
कलमकारी केवल चित्र बनाना नहीं है—यह एक गहन प्रक्रिया है। कपड़े को गोबर, ब्लीच और भैंस के दूध से तैयार किया जाता है। रंग पूरी तरह प्राकृतिक होते हैं—अनार से पीला, मंजिष्ठा से लाल, और फिटकरी से टिकाऊपन। हर कपड़ा, हर डिजाइन महीनों की मेहनत और प्रेम का परिणाम है।
महिलाएं एक भक्ति गीत गाती हैं। ताली, मंजीरा और स्वर मिलकर गूंजते हैं—आवाज़ें जो अब आत्मनिर्भर हैं, स्वतंत्र हैं।
2011 में पद्म श्री से सम्मानित अनीता रेड्डी के लिए यह गीत ही सबसे बड़ा पुरस्कार है। “जब महिलाएं खुद को अपने रंगों में ढालती हैं, वहीं से असली बदलाव शुरू होता है,” वह मुस्कुराकर कहती हैं।
द्वारका सिर्फ हस्तशिल्प का केंद्र नहीं—यह आत्मनिर्भरता, संस्कृति और महिला नेतृत्व का एक जीवंत आंदोलन है। अगर आप भारत की असली, जड़ से जुड़ी कला से जुड़ना चाहते हैं—तो द्वारका सिर्फ एक ब्रांड नहीं, एक प्रेरणादायक कहानी है… हर धागे में बसी हुई।




