कला की कोई उम्र नहीं होती: मिलान तक पहुंची जुड़हैया बाई बैगा की रंगों भरी कहानी - pravasisamwad
July 28, 2025
15 mins read

कला की कोई उम्र नहीं होती: मिलान तक पहुंची जुड़हैया बाई बैगा की रंगों भरी कहानी

उम्र चाहे 80 की हो या 18 की, जब कल्पना रंग पकड़ती है, तो एक पूरी सभ्यता जीवित हो उठती है। ऐसा ही कुछ कर दिखाया है जोधइया बाई बैगा ने, एक ऐसी महिला जिन्होंने, लुप्तप्राय बैगा चित्रकला, को फिर से जन-जन तक पहुँचाने का बीड़ा उठाया है।

एक समय था जब बैगा समुदाय के घरों की दीवारें बड़ादेव और बघासुर जैसे पारंपरिक देवताओं के चित्रों से सजी रहती थीं। ये चित्र न केवल घर की शोभा बढ़ाते थे, बल्कि आदिवासी जीवन के विश्वासों और पर्यावरण से उनके जुड़ाव को भी दर्शाते थे। पर समय के साथ, यह परंपरा धीरे-धीरे गुम होने लगी  यहां तक कि आज की पीढ़ी के कई युवा बैगा इन चित्रों के अर्थ और महत्व से भी अनजान हैं।

लेकिन जोधइया बाई के प्रयासों ने इस विलुप्त हो रही कला को फिर से सांस्कृतिक चेतना का हिस्सा बना दिया है।

पिछले दस सालों में जोधइया बाई ने जो चित्र बनाए हैं, वे केवल रंग-बिंब नहीं, बल्कि देवलोक, भगवान शिव, और  बाघ जैसी पारंपरिक भारतीय अवधारणाओं पर आधारित गहन विचार हैं। उनके चित्रों में जंगल, वन्यजीव, पेड़, नदियां, सब कुछ एक जीवंत और आध्यात्मिक संवाद में दिखते हैं।

—स्व. आशीष स्वामी, जो बैगा कला के पुनर्जीवन में सहायक रहे हैं, कहते थे:

“बैगा वृक्षों और बाघों में भगवान शंकर को देखते हैं। यही कारण है कि जोधइया बाई के चित्रों में शिव कभी बघासुर के रूप में तो कभी पेड़ की आकृति में दिखाई देते हैं।”

बैगा चित्रकारी महज़ कला नहीं, एक परंपरागत दृष्टिकोण है जहां पर्यावरण, जंगल और देवत्व एक-दूसरे में समाहित हैं। मिट्टी से बने रंगों में, दीवारों पर उकेरे गए ये चित्र बैगा जीवनदर्शन की झलक देते हैं।

बैगा आदिवासियों के लिए चित्र बनाना कोई अलग गतिविधि नहीं, बल्कि उनके  दैनिक जीवन और धार्मिक विश्वासों का हिस्सा है। घर की दीवारें उनके कैनवास हैं, और उनके अनुभव, भावनाएं, प्रकृति और परंपराएं उस पर आकार लेती हैं।

जोधइया बाई की कला ने इस पारंपरिक शैली को फिर से रचनात्मक ऊर्जा और पहचान दी है। उनकी यात्रा यह साबित करती है कि कला सिर्फ सृजन नहीं, संरक्षण भी है, अपनी संस्कृति, अपने पर्यावरण और अपने अस्तित्व का।

जोधइया बाई बैगा आज भी अपने चित्रों के ज़रिए यह सिखा रही हैं कि जो परंपराएं मिटती दिखती हैं, उन्हें सिर्फ याद नहीं किया जाता उन्हें फिर से जिया जा सकता है। मध्य प्रदेश के एक छोटे से गांव लोरहा की 80 वर्षीय जुड़हैया बाई बैगा आज अंतरराष्ट्रीय कला जगत में अपनी एक खास पहचान बना चुकी हैं। हाल ही में उनकी एक पेंटिंग इटली के मिलान में आयोजित एक प्रदर्शनी में प्रदर्शित हुई और वहां पहुंचते ही बिक भी गई।

लेकिन यह पहला मौका नहीं था जब जुड़हैया बाई की कला को अंतरराष्ट्रीय मंच मिला। पिछले कुछ वर्षों में उनकी पेंटिंग्स देश-विदेश की कई नामी दीर्घाओं में प्रदर्शित हो चुकी हैं  एक ऐसी महिला कलाकार के लिए यह अद्भुत उपलब्धि है जिसने 70 की उम्र में पहली बार ब्रश थामा था।

40 की उम्र में पति को खो चुकी जुड़हैया बाई ने अपने बच्चों की परवरिश मध्य प्रदेश के आदिवासी अंचल में की, जहां आज भी शिक्षा, सड़क और रोजगार जैसी मूलभूत सुविधाएं दूर की बात हैं। लेकिन जहां जीवन ने कुछ छीना, वहां कला ने उन्हें नया जीवन दिया।

“मैंने कभी नहीं सोचा था कि पेंटिंग करूंगी,” वे हँसते हुए बताती हैं। “लेकिन जब गांव में एक शिक्षक ने मुफ़्त में सिखाने की बात की, तो लगा क्यों न एक बार कोशिश की जाए।”

यह शिक्षक थे आशिष स्वामी, शांतिनिकेतन के पूर्व छात्र और जनगण तस्वीरखाना के संस्थापक। उनका उद्देश्य है आदिवासी कला को पुनर्जीवित करना और स्थानीय कलाकारों को पहचान दिलाना। 

जुड़हैया बाई बैगा की विशिष्ट कला शैली की तुलना कई बार प्रसिद्ध गोंड कलाकार जंगढ़ सिंह श्याम से की गई है। हालांकि उनकी कला माध्यम कुछ हद तक मिलते-जुलते हैं, लेकिन जुड़हैया बाई की चित्रकारी में एक अलग ही धड़कन है  जो उनकी बैगा संस्कृति से गहराई से जुड़ी हुई है।

कैनवास और कागज़ से शुरुआत करने के बाद, उन्होंने अपनी कला को मिट्टी, धातु और लकड़ी जैसे पारंपरिक माध्यमों तक फैलाया। उनका पोता पारंपरिक मुखौटे बनाता है, जिन्हें जुड़हैया बाई रंगों से सजाकर उनमें जंगल की कहानियों को जीवन देती हैं।

प्रकृति उनकी सबसे बड़ी प्रेरणा है। महुआ का पेड़, जो बैगा समाज में पूजनीय माना जाता है, उनके चित्रों में बार-बार दिखाई देता है  यह जीवन, आजीविका और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है।

उनकी कला ने अब सीमाओं को पार कर लिया है। भोपाल, दिल्ली, मिलान और पेरिस तक उनकी पेंटिंग्स प्रदर्शित हो चुकी हैं। साल 2022 में उन्हें उनकी उपलब्धियों के लिए नारी शक्ति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। और 2023 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म श्री (कला वर्ग) से नवाज़ा  यह एक ऐसी साधिका के लिए उपयुक्त सम्मान है, जिसने अपनी संस्कृति को जीवंत रखने के लिए कला को जीवन बना लिया।

जुड़हैया बाई की पेंटिंग्स में सिर्फ रंग नहीं, जीवन दर्शन है। पेड़, जानवर, नदियां सब कुछ आत्मीयता से चित्रित होता है।

“ये लोग प्रकृति को वस्तु नहीं, आत्मा का हिस्सा मानते हैं,” स्वामी बताते हैं। “इनकी कला में जंगली जानवर भी मासूम दिखते हैं और बादल शांति से बहते हैं।”

हालांकि अब जुड़हैया बाई की पेंटिंग्स ₹300 से ₹8000 तक में बिकती हैं, लेकिन उनके लिए यह केवल आमदनी का जरिया नहीं है। वे चाहती हैं कि उनकी कला उनके गांव और संस्कृति को दुनिया भर में पहचान दिलाए।

“अच्छा लगता है कि अब मेरी बहू और गांव की दूसरी महिलाएं भी पेंटिंग में रुचि ले रही हैं,” वे कहती हैं। “पहले अवसर नहीं थे, अब उम्मीद है।”

उनका घर अब एक प्रेरणा स्थल बन चुका है, यह साबित करते हुए कि सीखने की कोई उम्र नहीं होती, और कला हर दिल में बसती है।

“कला कभी पूर्ण नहीं होती,” वे दोहराती हैं। “हमेशा कुछ न कुछ सुधार की गुंजाइश रहती है।”

80 की उम्र में भी वे प्रसिद्धि नहीं, बल्कि विरासत रच रही हैं एक एक ब्रश स्ट्रोक से।

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Previous Story

मिलेट क्वीन” रायमती: खेतों से जी20 तक का सफर

Next Story

BCCI set to host Asia Cup in UAE, India-Pakistan clash on the Cards

Latest from Blog

Go toTop