लगभग तीन दशकों से सायदा कश्मीर की कठोर सर्दियों में खुद को गर्म रखने के लिए कांगड़ी — एक पारंपरिक मिट्टी की अंगीठी का सहारा लेती आ रही हैं। घाटी में पहने जाने वाले लंबे ऊनी फेरन के भीतर रखी यह कांगड़ी उनके जीवन का एक अभिन्न हिस्सा बन चुकी है।
“बचपन में हम अपने बड़ों को इसका इस्तेमाल करते देखते थे,” श्रीनगर की 48 वर्षीय निवासी सायदा कहती हैं। “वही जिज्ञासा धीरे-धीरे आदत बनी और फिर ज़रूरत।”

गर्माहट और देखभाल की रोज़मर्रा की परंपरा
सर्दियों में कांगड़ी रोज़मर्रा के जीवन से अलग नहीं होती। इसके भीतर शलजम और तेल रखा जाता है। गर्म होने के बाद उस तेल को ठंड से प्रभावित बच्चों के हाथ-पैरों पर लगाया जाता है।
“यह रोज़ की देखभाल का हिस्सा है,” सायदा बताती हैं।
हिमालय की गोद में बसा कश्मीर अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता है, लेकिन सर्दियाँ यहाँ एक अलग ही सच्चाई लेकर आती हैं। तापमान अक्सर माइनस 20 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता है। दिसंबर 2025 के अंत और जनवरी 2026 की शुरुआत में घाटी ने भीषण शीत लहर का सामना किया। लंबे बिजली कटौती के बीच भी एक सदियों पुरानी परंपरा लोगों को गर्माहट और सहारा देती रही — कांगड़ी।
आज भी, जब घरों में बिजली के हीटर और गैस आधारित विकल्प आ गए हैं, कांगड़ी सायदा के पास ही रहती है।
“जब बिजली चली जाती है और सर्दियों में यह अक्सर होता है तब कांगड़ी ही साथ होती है,” वह कहती हैं।
सावधानी से इस्तेमाल करने पर यह आराम देती है, लेकिन लापरवाही से जलने का खतरा भी रहता है। फिर भी इसे छोड़ देना कभी संभव नहीं लगा।

आग में बसी एक बचपन की याद
सायदा के बचपन की एक घटना आज भी उनके ज़ेहन में ताज़ा है।
“11 साल की उम्र में दूध लेने जाते समय एक पागल कुत्ते ने मेरा पीछा किया,” वह याद करती हैं। “मैं फेरन के भीतर कांगड़ी रखे हुए थी। डर के मारे मैंने उसे बाहर निकालकर कुत्ते पर फेंक दिया। वही पल मेरी जान बचा गया।”
कांगड़ी से कुछ भी व्यर्थ नहीं जाता। जब भीतर की आग राख में बदल जाती है, तो उसे इकट्ठा कर रसोई के बगीचे में मिलाया जाता है।
“यह मिट्टी को उपजाऊ बनाती है,” सायदा कहती हैं। “इससे सब्ज़ियाँ बेहतर उगती हैं।”
ऐसी छोटी-छोटी परंपराएँ ही लंबे और कठोर सर्द मौसम में परिवारों को संभाले रखती हैं।
कांगड़ी केवल गर्मी का साधन नहीं है, बल्कि कश्मीरी सर्दियों के जीवन का हिस्सा है जिसे उन कारीगरों की मेहनत जीवित रखती है, जिनका काम कांगड़ी के घर पहुँचने से बहुत पहले शुरू हो जाता है।

कांगड़ी की शुरुआत: गांदरबल के विलो (बेंत) के बाग़
सायदा के घर से दूर, गांदरबल के विलो के बाग़ों में कांगड़ी की यात्रा शुरू होती है।
शलबुग गाँव के 57 वर्षीय मंज़ूर अहमद ने अपना अधिकांश जीवन विलो के साथ काम करते हुए बिताया है — वही पौधा जो कांगड़ी की बाहरी संरचना बनाता है।
“सबसे पहले हम पेड़ों से विलो काटते हैं, फिर उसे पानी में उबालते हैं,” वह बताते हैं। “इसमें बहुत मेहनत और धैर्य लगता है।”
उबालने के बाद उसकी ऊपरी छाल हटाई जाती है। हर चरण में लगभग दर्जन भर कुशल कारीगरों की ज़रूरत पड़ती है। ज़मीन की देखभाल भी बेहद ज़रूरी होती है।
“अगर बेकार घास उग आए, तो पूरी फसल नष्ट हो सकती है,” मंज़ूर कहते हैं।
इसके बाद तैयार विलो से टोकरियाँ, फर्नीचर और कांगड़ी का बुना हुआ ढांचा बनाया जाता है।

संघर्ष करती एक परंपरागत कला
यह काम शारीरिक रूप से बेहद कठिन है, और युवा पीढ़ी अब इससे दूर होती जा रही है।
“उनके कपड़े गंदे हो जाते हैं और उन्हें इसमें पैसा नज़र नहीं आता,” मंज़ूर कहते हैं। “वे आसान काम चाहते हैं।”
प्लास्टिक के सस्ते विकल्पों ने विलो के काम की आमदनी को और कम कर दिया है।
“प्लास्टिक पर्यावरण को नुकसान पहुँचाता है, लेकिन सस्ता होने की वजह से बिकता है,” वह कहते हैं और मानते हैं कि सरकार की भूमिका इस कला को बचाने में अहम हो सकती है।
“अगर प्लास्टिक पर रोक लगे, तो हमारी सेहत और रोज़गार दोनों बेहतर होंगे।”
कठिनाइयों के बावजूद, गांदरबल के बने उत्पाद पूरे कश्मीर में बिकते हैं और सर्दियों में दिल्ली तक भेजे जाते हैं।
“यह काम कठिन है,” मंज़ूर कहते हैं। “लेकिन धैर्य और देखभाल के बिना सब कुछ खत्म हो जाएगा।”
कांगड़ी का दिल: पाखेरपोरा में मिट्टी का काम
विलो से बनने के बाद कांगड़ी मिट्टी के पास पहुँचती है।
पाखेरपोरा गाँव में 52 वर्षीय कुम्हार गुलाम क़ादरी कुमार पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा को निभाते हुए हाथ से कुंडल — कांगड़ी के भीतर रखे जाने वाले मिट्टी के पात्र — बनाते हैं।
“मैं कभी स्कूल नहीं गया,” वह कहते हैं। “ज़िंदगी भर यही काम किया है।”
दशकों तक उन्होंने हाथ से चलने वाले चाक पर काम किया। दो साल पहले उन्होंने 11,000 रुपये बचाकर बिजली वाला चाक खरीदा।
“इससे मेहनत कम हुई और काम तेज़ हुआ,” वह कहते हैं। “लेकिन जब बिजली नहीं होती, तो हम फिर हाथ वाले चाक पर लौट आते हैं। हाथों का मिट्टी से जुड़ा रहना ज़रूरी है।”
धैर्य माँगने वाली मिट्टी
यह प्रक्रिया चाक चलने से बहुत पहले शुरू हो जाती है। मिट्टी पास के बाग़ों से लाई जाती है, जो अब शहरीकरण के कारण कम होते जा रहे हैं।
“हम लगभग सौ स्तरों से गुज़रते हैं,” गुलाम बताते हैं। मिट्टी को छाना जाता है, भिगोया जाता है, पैरों से दबाया जाता है, सुखाया और पीटा जाता है — यह एक बेहद श्रमसाध्य प्रक्रिया है।
कम आमदनी के बावजूद वह इस काम से जुड़े हुए हैं।
“यह मेहनत की कमाई है, लेकिन साफ़ है,” वह कहते हैं। “इसमें संतोष मिलता है।”
हालाँकि आधुनिक बर्तनों ने मिट्टी के बर्तनों की जगह ले ली है, फिर भी कुंडलों की माँग बनी हुई है।
“कठोर सर्दियों में आज भी लोग कांगड़ी पर निर्भर हैं,” वह कहते हैं।
कांगड़ी को अंतिम रूप देना
कांगड़ी का अंतिम रूप अली मोहम्मद डार जैसे कारीगरों के हाथों में बनता है। 65 वर्षीय डार पिछले पाँच दशकों से कांगड़ियाँ बना रहे हैं।
वह 12 प्रकार की कांगड़ियाँ बनाते हैं — बच्चों के लिए छोटी कांगड़ी से लेकर शीशों से सजी दुल्हन की कांगड़ी तक।
“मेरे पिता ने मुझे यह कला सिखाने भेजा,” वह याद करते हैं। “शुरुआत में कठिन था, लेकिन यह काम इंसान के साथ रह जाता है।”
एक सामान्य सर्दी के मौसम में वह 300 से 400 कांगड़ियाँ बनाते हैं।
“जब सर्दी पूरी तरह पड़ती है, तब समझ आता है कि कांगड़ी आज भी कितनी ज़रूरी है,” वह कहते हैं। “घाटी के लाखों घरों में इसका इस्तेमाल होता है।”
“सर्दियों की पत्नी”
“कांगड़ी सिर्फ़ आग का पात्र नहीं है, यह हमारी जीवनरेखा है,” सायदा कहती हैं।
“हमारे बुज़ुर्ग कहा करते थे कि घर में चाहे खाना या पानी न हो, कांगड़ी ज़रूर होनी चाहिए। इसलिए इसे सर्दियों की पत्नी कहा जाता था।”
चलने-फिरने में आसान, भरोसेमंद और टिकाऊ — कांगड़ी तब भी गर्माहट देती है जब आधुनिक व्यवस्थाएँ जवाब दे देती हैं।
“यह घरों के भीतर भी चलती है और गलियों में भी,” वह कहती हैं। “यह सिर्फ़ गर्मी नहीं, बल्कि हमारी सहनशक्ति और परंपराओं का प्रतीक है।”
जैसे-जैसे सर्दी गहराती है, कांगड़ी फेरन के भीतर अपनी जगह बनाए रखती है — स्थिर, परिचित और भरोसेमंद।
कांगड़ी बनी रहती है।



