जब अयोध्या के राम मंदिर की ऊँची कलशों को पहली बार सूर्य की कोमल किरणों ने छुआ, तो वातावरण में कुछ विशेष था—कुछ ऐसा जो हिमालय की आत्मा से जुड़ा हुआ प्रतीत होता था। बालरूप राम लल्ला दिव्य आभा में आलोकित खड़े थे, मुलबेरी रेशम से बनी पोशाक धारण किए हुए। पर इस वस्त्र की विशेषता केवल उसका महीन रेशम नहीं था बल्कि उस पर सजी थी उत्तराखंड की पारंपरिक और पावन लोककला ऐपन।
लाल और सफेद रंगों में बने जटिल डिज़ाइन, कुशल हस्तशिल्पियों के हाथों से प्रेमपूर्वक रचे गए थे। ये डिज़ाइन केवल सजावट नहीं थे ये तो मंदिर से भी पुरानी कहानियाँ कह रहे थे यह वस्त्र किसी साधारण पूजा-अर्चना का वस्त्र नहीं था। यह उत्तराखंड की ओर से एक भावपूर्ण अर्पण था संस्कृति की ओर से ईश्वर को समर्पित एक आलिंगन। इस विशेष पोशाक के पीछे थे उन कारीगरों के महीनों के परिश्रम, जिन्होंने अपनी कला और आत्मा को हर चित्र में उकेरा। इसके मूल में थी प्राचीन कुमाऊँनी परंपरा—ऐपन

ऐपन आमतौर पर पर्वों और अनुष्ठानों में घर की दीवारों व चौखटों पर बनती है, पर इस बार उसे एक पवित्र वस्त्र पर साकार किया गया।
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने इस क्षण को “एक शुभ अवसर” बताया और कहा कि यह सांकेतिक कार्य अयोध्या की आध्यात्मिक भूमि को उत्तराखंड की पवित्र माटी से जोड़ता है। “शिल्प और श्रद्धा का यह अनोखा संगम केवल एक भेंट नहीं, बल्कि एक पुनर्जीवन है। ऐपन कला, जिसे अक्सर पहाड़ों की स्त्रियाँ पीढ़ियों से मौन साधना की तरह सहेजती आई हैं, आज राष्ट्रीय मंच पर केंद्र में आ खड़ी हुई है।”
उत्तराखंड की पारंपरिक और बारीक हस्तकला, ऐपन, धीरे-धीरे गुमनामी में खो रही थी। लोग इसे भूलते जा रहे थे तभी एक युवा लड़की ने इसकी तक़दीर बदलने की ठान ली। जो कला कभी खत्म होती दिख रही थी, आज वह राष्ट्रीय पहचान पा रही है सिर्फ इसलिए क्योंकि एक लड़की ने अपने संस्कृति की ताक़त पर विश्वास किया और उसे बचाने का साहस दिखाया।
मीनाक्षी खाती, 24 वर्षीय एक कलाकार, जब कॉलेज में थीं, तभी उन्होंने देखा कि यह समृद्ध कला विलुप्ति की कगार पर है। उनके मन में इसे बचाने की एक गहरी चाह जगी।
वह कहती हैं, “मैं पारंपरिक आइपण को वापस लाना चाहती थी, जो उत्तराखंड का गौरव है, और इसकी सांस्कृतिक महत्ता को बनाए रखना चाहती थी।“
‘आर्पण’ शब्द से बना ‘ऐपन ’ का मतलब होता है – लेखन या अर्पण करना। यह कला दाएं हाथ की आखिरी तीन उंगलियों से की जाती है।
चावल के आटे का घोल बनाकर उसे लाल मिट्टी या लाल रंग की ज़मीन पर सजावटी आकृतियों में सजाया जाता है। आमतौर पर यह चित्र दीवारों, आंगनों और मंदिरों में बनाए जाते हैं। यह कला त्योहारों के समय खास तौर पर की जाती है क्योंकि माना जाता है कि ये चित्र भगवान को आमंत्रित करते हैं और नकारात्मक शक्तियों को दूर रखते हैं।
मीनाक्षी बचपन से ही इस कला को सुनती और अपने आस-पास के घरों में देखती थीं। वह बताती हैं:
“दादी–नानी अपनी बेटियों को यह कला सिखाती थीं और फिर वे अपनी बेटियों को सिखाती थीं। इस तरह ये परंपरा चलती रहती थी। यह एक पीढ़ियों से चली आ रही कला है।”
मीनाक्षी याद करती हैं कि बचपन में वह अपनी मां और दादी के साथ चावल के घोल से अक्सर आइपण की आकृतियाँ बनाती थीं।जैसे-जैसे मैं बड़ी हुई, मैंने देखा कि यह कला केवल परिवारों में ही नहीं, बल्कि समाज में भी धीरे-धीरे कम होती जा रही थी। – वह कहती हैं।
यहाँ उस 2019 में, मिनाक्षी खाती ने ‘मिनाकृति: द ऐपन प्रोजेक्ट’ की शुरुआत की। उनका उद्देश्य था कि उत्तराखंड की पारंपरिक लोककला ऐपन को उसकी खोई हुई पहचान मिले। साथ ही, इस पहल ने स्थानीय महिलाओं को रोज़गार का अवसर भी दिया।
लेकिन जैसा कि मिनाक्षी बताती हैं, यह सफर आसान नहीं था।
“चूंकि यह एक पारंपरिक कला है, मुझे पहले इसकी बारीकियों को समझना था,” वह कहती हैं। “कभी-कभी मैं सोचती थी कि क्या मैं इसकी सारी गहराइयाँ सीख पाऊँगी और इसे सही तरह से दोहरा पाऊँगी।”
इस समझ को बढ़ाने के लिए उन्होंने बार-बार कुमाऊं का दौरा किया, जहाँ यह कला जन्मी थी। उन्होंने गाँवों के बुज़ुर्गों और स्थानीय महिलाओं से बातचीत की।

जब मिनाक्षी को लगा कि अब वह ऐपन की जानकारी अच्छे से हासिल कर चुकी हैं, तो उन्होंने कुमाऊं की स्थानीय महिलाओं से बात करना शुरू किया और उनकी रुचि जानने की कोशिश की कि क्या वे इस कला को फिर से जीवित करने में साथ देंगी।
“हमने कुछ नेमप्लेट्स और वॉल हैंगिंग से शुरुआत की,” वह बताती हैं। उन्होंने इनकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर साझा कीं, जिन्हें अच्छा रिस्पॉन्स मिला। धीरे-धीरे और भी महिलाएँ इस कला से जुड़ने लगीं और उन्होंने सजावटी वस्तुएँ बनाकर कमाई शुरू की।
आज मिनाक्षी की टीम में 30 महिलाएँ जुड़ी हुई हैं, जो हर महीने ₹5,000 से ₹10,000 तक कमा लेती हैं, यह इस पर निर्भर करता है कि वे कितने ऑर्डर पूरे करती हैं। साथ ही, उनकी छह लोगों की टीम स्कूलों और कॉलेजों में वर्कशॉप के ज़रिए बच्चों को ऐपन सिखाती है।
“मैं अब तक लगभग 20,000 बच्चों को ऐपन सिखा चुकी हूँ। ये बच्चे देहरादून, हरिद्वार जैसे शहरों से हैं। अगर कोई बच्चा खास रुचि दिखाता है, तो मैं उसे सजावटी वस्तुएँ बनाने के लिए प्रेरित करती हूँ और फिर उन बच्चों को अपने ग्राहकों से जोड़ देती हूँ।”
“महिलाएँ अपने खाली समय में काम करती हैं, और मैं उन्हें बता देती हूँ कि ऑर्डर कितने दिन में पूरा करना है,” वह बताती हैं।
इन महिलाओं द्वारा बनाई जाने वाली वस्तुओं में नेम प्लेट्स, कोस्टर्स, शोपीस, केटल्स आदि शामिल हैं। दिवाली पर पूजा की थाली, तोरण, करवा चौथ के लिए लोटा, और दिए बनाए जाते हैं। दियों की कीमत ₹20, राखी ₹25 और थाली ₹200 होती है।
मिनाक्षी मानती हैं कि सबसे ख़ास बात यह है कि अब उत्तराखंड और आस-पास के राज्यों में भी लोग ऐपन को जानने लगे हैं।
“शुरुआत में मुझे सबसे बड़ी चुनौती यही दिखती थी कि क्या इस कला से एक सफल व्यवसाय मॉडल बन पाएगा या नहीं,” वह कहती हैं।
लेकिन अब, पीछे मुड़कर देखने पर, वह कहती हैं — “हर कोशिश इसके लायक थी।”




