एक वक़्त था जब लोग बिना ज़रूरत बाज़ार नहीं जाते थे। मुझे याद है मेरी दादी माँ महीने में केवल एक बार सौदा लेनेबाज़ार जाती थीं और वो भी ज़रूरी सामानों की लिस्ट बनाकर। सब्ज़ी–भाजी घर में साप्ताहिक रूप से आती थी औरकपड़े–लत्ते सिर्फ़ तीज–त्यौहार पर। हम वैसे–वैसे नहीं हैं। हमें एक चीज़ की ज़रूरत होती है तो झट गाड़ी उठाकर भागते हैंऔर चार और चीज़ों के साथ लौटते हैं। ज़्यादातर लोगों का यही हाल है।
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वक़्त के साथ बाज़ार का स्वरूप बदला है, पूरी अवधारणा ही नई हो गई है। उपभोक्ता का मिज़ाज भी बदला है। कुछ नहीं तोलोग ‘विंडो शॉपिंग’ के लिए चले जाते हैं। कुछ खाया-पिया, कुछ छोटा-मोटा गैरज़रूरी खरीद भी लिया। कुछ को सेल ललचातीहै तो कुछ को ऑनलाइन शॉपिंग में मज़ा आता है। घंटों सर्फ़ करते रहते हैं सामानों को और रोज़ ही कुछ न कुछ ऑर्डर कर देतेहैं। कुछ दुकानें बड़ी खरीद पर इंटरेस्ट-फ्री शॉपिंग का प्रलोभन देती हैं। कहीं एक ख़रीद पर एक मुफ़्त का वादा है तो कहीं लकीड्रॉ में सोने-चाँदी के सिक्के से लेकर इलेक्ट्रॉनिक सामान देने की बात।
ऐसा अक्सर होता है कि आपको कुछ नहीं ख़रीदना होता लेकिन आपके मित्र कहते हैं—“अरे चलो ना, क्लियरेंस सेल लगी है, कुछ आइटम पर तो एक के साथ एक फ़्री भी है।” और आप चल देते हैं। जाते इस पक्के इरादे के साथ हैं कि मुझे नहीं ख़रीदनाहै, मैं बस साथ जा रही/रहा हूँ, लेकिन जब लौटते हैं तो आपके हाथ में भी थैले होते हैं।
हम में से अक्सर लोग ऐसा ही करते हैं। जब कहीं किसी दुकान या ब्रैंड पर सेल का बोर्ड देखते हैं तो ख़ुद को खरीदारी करने सेरोक ही नहीं पाते। ऐसा लगता है जैसे हम दुकानदार को बेवक़ूफ़ बनाकर कम दाम में ज़्यादा सामान ख़रीद कर ला रहे हैं। मन हीमन एक अलग तरह की जीत का एहसास होता है—“बड़ी अच्छी डील मिल गई,” कुछ ऐसा कहते हैं बड़ी शान से।
न्यूरो मार्केटिंग के कुछ जानकारों का कहना है कि जब भी हम कहीं सेल का बोर्ड लगा देखते हैं तो हमारे ज़हन में एक ख़ास तरहका जज़्बा पैदा हो जाता है। हमारे दिमाग़ में कुछ ख़ास तरह की तरंगें पैदा होती हैं, जो दिमाग़ को खरीदारी करने का आदेश देनेलगती हैं। ऐसे में हम ये फ़ैसला सोच-समझकर नहीं करते कि हमें क्या ख़रीदना है और क्या नहीं। हमें उस चीज़ की ज़रूरत है भीया नहीं। बहुत मर्तबा हम यही सोचकर खरीदारी कर लेते हैं कि चलो अभी ख़रीद लेते हैं, जब वक़्त आएगा तब इस्तेमाल करलेंगे, या किसी को तोहफ़े में ही दे देंगे।
हालाँकि कुछ लोग आज भी हैं जो इस अति-उत्पादन के युग में प्रलोभनों से बचते हुए कम उपभोग करना चाहते हैं और अपने घरको साफ़-सुथरा रखना चाहते हैं, लेकिन कुछ अन्य लोगों को लगता है कि उनकी खरीदारी एक समस्या बनती जा रही है। अक्सरये लोग बेइरादा घर से निकलते हैं और गैरज़रूरी सामानों के थैले उठाए वापस लौटते हैं। एक शोध समीक्षा से पता चलता है किखरीदारी की लत दुनिया की लगभग 5 फ़ीसदी आबादी को प्रभावित कर रही है। हालाँकि इस लत की गंभीरता अलग-अलगलोगों में अलग-अलग स्तर की हो सकती है। विशेषज्ञों को लगता है कि यह समस्या बढ़ रही है और इसके उपचार के लिए बेहतरसाधनों की ज़रूरत है।
मेरी एक 34 वर्षीय मित्र है जो स्ट्रेस कम करने के लिए शॉपिंग पर चली जाती है। दरअसल स्ट्रेस से परेशान लोग खरीदारी करतेसमय एक तरह के नशे में होते हैं, लगभग उसी तरह जैसा कुछ ड्रग्स लेने वाले लोगों का अनुभव होता है। स्ट्रेसग्रस्त लोग जैसे हीखरीदारी का फ़ैसला करते हैं, उनके अंदर पॉज़िटिव एनर्जी का संचार हो जाता है। न्यूयॉर्क की मनोवैज्ञानिक जॉर्डना जैकब्स कहतीहैं, “जब हम खरीदारी करते हैं तो हमें डोपामाइन (मस्तिष्क के न्यूरॉन्स से निकलने वाला रसायन) का एक हिट मिलता है। इससेकुछ समय के लिए हमारा मूड अच्छा हो जाता है।”
सिर्फ़ मेरी मित्र ही नहीं, बहुत सारे लोग दुख और तकलीफ़ से ध्यान हटाने के लिए खरीदारी का सहारा लेते हैं। लेकिन इस तरहकी गैरज़रूरी खरीदारी से न सिर्फ़ समय और पैसों की बर्बादी होती है, बल्कि घर में भी कचरा इकट्ठा होता जाता है। मैं एक ऐसीमहिला को जानती हूँ जिसे ख़ुद याद नहीं कि उसके पास कितने कपड़े हैं, क्या-क्या है, और वो लगातार फिर भी खरीदे जाती है।अब ऐसे लोग भी इस खरीदारी की बीमारी से निजात चाहते हैं।
न्यूरो मार्केटिंग रिसर्चर डैरेन ब्रिजर का कहना है कि शॉपिंग करना किसी ख़ज़ाने की तलाश करने जैसा ही होता है। जब आपकिसी शोरूम में जाते हैं या किसी शॉपिंग साइट पर जाते हैं, तो बहुत सी चीज़ें नज़र आती हैं। आप हर एक चीज़ को बड़े चाव सेदेखते हैं। आपकी नज़र उस ख़ास चीज़ को तलाशती रहती है जो देखते ही पहली नज़र में पसंद आ जाए, जो बिल्कुल अलगहो। उस चीज़ की मौजूदगी आपको अलग पहचान दिलाए, दस लोग आपसे पूछें कि बहुत अच्छा है, कहाँ से लिया। और जब वोमनचाही चीज़ आपको मिल जाती है तो मानो मन की मुराद पूरी हो जाती है। उस ख़ास चीज़ की तलाश आपको खुशी काएहसास कराती रहती है। रिसर्चर इस एहसास को इमोशनल एंगेजमेंट कहते हैं। उनके मुताबिक जैसे ही आपको आपकी पसंदकी चीज़ मिल जाती है, आपके दिमाग़ में ख़ास तरह की तरंगें पैदा होती हैं जो दिमाग़ को खरीदारी करने का आदेश देती हैं।
जब आप शॉपिंग के लिए निकलते हैं तो सोचते हैं—चलो लगे हाथ अपने पसंद के ब्रांड वाली दुकान का भी एक चक्कर लगाही लेते हैं। हो सकता है कोई काम की चीज़ मिल जाए। इसी तरह अगर किसी चीज़ के लिए आपकी दीवानगी है और जब आपबाज़ार जाते हैं तो पहले से ही तय होता है कि फलाँ चीज़ तो लेनी है। मिसाल के लिए आपको जूतों का शौक़ है तो जब भीआप शॉपिंग के लिए जाते हैं तो कोशिश रहती है कि कोई अच्छा जूता नज़र आए तो ज़रूर ख़रीद लेंगे।
हम में से अक्सर लोग खरीदारी करने के शौक़ीन नहीं होते, लेकिन जिस तरह बाज़ार में चीज़ें हमें लुभाती हैं, वो हमें एक तरहसे खरीदारी करने का आदी बना देती हैं। हफ़्तेवार बाज़ार लगने का चलन सारी दुनिया में है और बहुत से लोग हर हफ़्ते इसजज़्बाती उठा–पटक के दौर से गुज़रते हैं कि उन्हें बाज़ार जाकर खरीदारी करनी है।
कुछ रिसर्चर तो ये भी मानते हैं कि बहुत बार हम अपने अंदर की कलह को शांत करने के लिए भी शॉपिंग करते हैं। जब कुछ समझ नहीं आता कि क्या किया जाए. ऐसे में बहुत से लोग ख़रीदारी करके अपने दिमाग़ को उस परेशानी से कुछ वक़्त के लिए दूर कर लते हैं.
इंटरनेट पर कुछ चीज़ों के रिव्यू पढ़ने के बाद भी ऐसा होता है कि हम उस चीज़ को ख़रीद लेते हैं, या बहुत बार हमारे दोस्त ही हमेंऐसा करने के लिए मजबूर कर देते हैं। दरअसल वो अपनी बातों से आपको भी ललचा देते हैं। डिजिटल दुकानों की बड़ी होतीसामानों की सूची और भी लुभाती है जब ये छूट और दूसरे आकर्षक प्रस्तावों के साथ पेश की जाती हैं। त्यौहारों का मौसम आनेपर तो ये कोशिश और भी तेज़ हो जाती है। यहाँ ये भी अहम है कि इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों की गिनती 50 करोड़ तक पहुँचचुकी है और अगले तीन सालों में ये संख्या 82 करोड़ से भी ज़्यादा हो जाएगी—यानी डिजिटल दुकानों के लिए ज़्यादा से ज़्यादासंभावित ग्राहक।
बाज़ारवाद से उपजी इस बीमारी पर वित्तीय विषयों की लेखिका मिशेल मैक्ग्रा ने साल 2017 में “द नो स्पेंड ईयर” नामक किताबलिखी। अगर आप गूगल, यूट्यूब और रेडिट पर “नो-बाय ईयर” या “नो-स्पेंड चैलेंज” तलाशें तो ढेरों परिणाम मिलते हैं। यूट्यूबके ब्यूटी चैनलों पर “नो-बाय” आम शब्द है। वहाँ “नो-बाय मंथ” या “लिपस्टिक नो-बाय” जैसी चीज़ें खूब दिखती हैं। विशेषज्ञोंका कहना है कि एक साल तक खरीदारी नहीं करने से मानसिक सेहत सुधरती है। सैन फ्रांसिस्को की कंज़्यूमर साइकोलॉजिस्टकिट यैरो कहती हैं, “पिछले क़रीब 20 साल से हम सस्ते माल से भर गए हैं। लोगों के पास सामान रखने के लिए जगह कम पड़रही है।” इस बात से वे हैरान नहीं होतीं कि लोग “नो-बाय” में भी खरीदारी कर रहे हैं।
सिडनी, ऑस्ट्रेलिया की 26 साल की लेखिका और ब्लॉगर एम्मा नॉरिस 2019 को नो-बाय ईयर बनाने का प्रयास कर रही हैं। वहबोरियत और अकेलेपन से बचने के लिए ढेर सारे कपड़े ख़रीदती थीं। खरीदारी बंद करने का फ़ैसला करने से पहले नॉरिस नेअपनी अलमारियों की छँटाई की। इससे उनको पता चला कि उनके पास कितने कपड़े हैं और अब और कपड़ों की ज़रूरत नहींहै। कुछ ज़रूरी चीज़ें ख़रीदने के अलावा अब शॉपिंग करने की उनकी कोई योजना नहीं है। नॉरिस को उम्मीद है कि इससे उनकेपास ज़्यादा समय होगा और वह अपने पार्टनर के साथ बाली और दूसरे देश घूम सकेंगी।
अगर आप बेवजह की खरीदारी से बचना चाहते हैं तो सबसे पहला काम ये कीजिए कि बिना वजह बाज़ार जाने से बचिए—बिल्कुल वैसे ही जैसे अगर आप शराब नहीं पीते हैं तो शराबख़ाने में जाने से बचते हैं। ऑनलाइन अगर खरीदारी करते हैं तो सेलवाले खाने में सबसे बाद में जाइए। ऑनलाइन आप उन्हीं चीज़ों को तलाशें जिनकी आपको ज़रूरत है। अगर किसी चीज़ कीबहुत ज़रूरत है तो उसी चीज़ को अपनी लिस्ट में सबसे पहले रखें। अगर कोई चीज़ ख़रीदने की फ़ौरन चाहत हो भी रही है तो उसेफ़िलहाल टाल दें। दूसरे किसी मौक़े पर खरीदारी करें ताकि बेवजह पैसा ख़र्च करने से आप ख़ुद को बचा सकें। खरीदारी जब भीकरें, अपनी ज़रूरत के मुताबिक़ करें। दिमाग़ बहुत बार आपको पैसे ख़र्च करने के लिए कहेगा, लेकिन आपको अपने दिल औरदिमाग़ को यही समझाना है—जब ज़रूरत होगी, तब ख़रीद लेंगे।
साभार: Pehachaan.com




