एक ऐसे देश में, जहाँ हर क्षेत्र अपनी पहचान वस्त्रों के माध्यम से व्यक्त करता है, एक नई पहल चुपचाप एक बड़ा सपना बुन रही है—इन तमाम स्वरों को एक सुसंगत, सामंजस्यपूर्ण कथा में जोड़ने का। इस सप्ताह राष्ट्रीय राजधानी में आरंभ हुई ‘पद्मा डोरी’ केवल एक वस्त्र परियोजना नहीं, बल्कि जुड़ाव, शिल्पकला और आधुनिक आकांक्षाओं की कहानी है।
इसके मूल में एक सरल, लेकिन प्रभावशाली विचार है—क्या हो अगर भारत के पूर्वोत्तर का मुलायम एरी रेशम, मध्य प्रदेश की चंदेरी बुनाई की हल्की, पारदर्शी सुंदरता से मिल जाए? परिणाम सिर्फ एक कपड़ा नहीं, बल्कि भौगोलिक सीमाओं, परंपराओं और समुदायों के बीच एक जीवंत संवाद है।
इस पहल का नेतृत्व नॉर्थ ईस्टर्न हस्तशिल्प एवं हथकरघा विकास निगम लिमिटेड (एनईएचएचडीसी) ने किया है, जो पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास मंत्रालय के अधीन कार्य करता है। इस परियोजना को गति मिली मध्य प्रदेश के जिला पुरातत्व, पर्यटन और संस्कृति परिषद (डीएटीसीसी) के साथ रणनीतिक साझेदारी से। ₹4.84 करोड़ के वित्तीय सहयोग के साथ, यह पहल एक ऐसी वस्त्र मूल्य श्रृंखला की नींव रखती है, जो भारत के पूर्व, मध्य और पश्चिम को जोड़ती है।
कोकून से परिधान कला तक
‘पद्मा डोरी’ की यात्रा फैशन स्टूडियो से बहुत दूर, असम, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड और मेघालय के शांत, हरित इलाकों से शुरू होती है। यहाँ एरी रेशम—जिसे इसके अहिंसक उत्पादन के कारण “अहिंसा रेशम” भी कहा जाता है—पीढ़ियों से इस कला को जीवित रखे कारीगरों के कुशल हाथों से तैयार होता है।
इन पूर्वोत्तर क्षेत्रों से यह रेशम पश्चिम की ओर ऐतिहासिक नगर चंदेरी पहुँचता है, जहाँ सदियों पुरानी बुनाई परंपरा आज भी जीवंत है। अपनी हल्की बनावट और पारदर्शी सुंदरता के लिए प्रसिद्ध चंदेरी बुनाई, इस रेशम को एक ऐसे कपड़े में बदल देती है जो परंपरा और परिष्कार दोनों का संगम है।
यह वस्त्र गर्माहट और हल्केपन, परंपरा और नवाचार का अनूठा मेल है—जो वैश्विक स्तर पर बढ़ती स्वदेशी विलासिता की मांग में पूरी तरह फिट बैठता है।

सहयोग से सृजन
मारा कोचु के लिए यह पहल केवल एक उत्पाद आरंभ से कहीं अधिक है। वे कहते हैं, “यह सिर्फ एक नया कपड़ा बनाने की कोशिश नहीं है, बल्कि एक ऐसा मंच तैयार करना है जहाँ कारीगर, अभिकल्पक और उद्योग विभिन्न क्षेत्रों से मिलकर काम करें।”
इस सहयोग की भावना उद्घाटन कार्यक्रम में स्पष्ट दिखाई दी। आगंतुकों को इस वस्त्र की पूरी यात्रा का अनुभव कराया गया—रेशम कीट पालन से लेकर सूत कातने और फिर बारीक बुनाई तक। अभिकल्पकों और कलाकारों ने इसे एक जीवंत, विकसित होती प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत किया, न कि केवल एक तैयार उत्पाद के रूप में।
स्थानीय जड़ें, वैश्विक विस्तार
जहाँ ‘पद्मा डोरी’ भारतीय परंपराओं में गहराई से रची-बसी है, वहीं इसकी दृष्टि वैश्विक है। लखी चौधरी के अनुसार, यूनाइटेड किंगडम और यूनाइटेड स्टेट्स जैसे बाजारों को प्राथमिक लक्ष्य बनाया गया है।
आज के दौर में, जहाँ उपभोक्ता टिकाऊ और नैतिक उत्पादों को प्राथमिकता देते हैं, इस कपड़े का पर्यावरण-अनुकूल उत्पादन, प्राकृतिक रेशे और हस्तनिर्मित प्रामाणिकता इसे खास बनाते हैं। यह केवल एक वस्त्र नहीं, बल्कि ‘नैतिक विलासिता’ की कहानी है।
सिर्फ कपड़ा नहीं, आजीविका भी
सौंदर्य और बाजार से आगे बढ़कर ‘पद्मा डोरी’ एक गहरा वादा भी करती है—आजीविका का। पूर्वोत्तर के कच्चे माल उत्पादकों को मध्य भारत के बुनाई केंद्रों से जोड़कर यह पहल एक निरंतर मूल्य श्रृंखला बनाती है, जो कारीगरों की आय बढ़ाने और उनके जीवन में स्थिरता लाने में मदद करेगी।
यह पहल ‘भारत में निर्माण’ के उस व्यापक दृष्टिकोण के अनुरूप भी है, जिसमें पारंपरिक शिल्प को आधुनिक संदर्भ में पुनर्परिभाषित किया जा रहा है, बिना उसकी आत्मा खोए।
एक कपड़ा, एक दर्शन
कई मायनों में ‘पद्मा डोरी’ भारतीय वस्त्रों को देखने के नजरिए में बदलाव का प्रतीक है—अब ये केवल क्षेत्रीय पहचान नहीं, बल्कि एक साझा सांस्कृतिक विरासत की परस्पर जुड़ी अभिव्यक्तियाँ हैं।
जैसा कि कोचु कहते हैं, यह पहल “भारतीय वस्त्रों के लिए एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है, जहाँ भूगोल, संस्कृति और शिल्प एक साथ आते हैं।”
और शायद यही इसका सबसे सुंदर धागा है—दूर-दूर के क्षेत्रों को जोड़ते हुए ‘पद्मा डोरी’ हमें याद दिलाती है कि भारत की विविधता ही उसकी सबसे बड़ी डिज़ाइन है।



