माजुली से अमेरिका तक: समागुरी सत्र के मुखौटे लेकर जा रहे हैं असम की सांस्कृतिक विरासत | Pravasi Samwad
June 21, 2026
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माजुली से अमेरिका तक: समागुरी सत्र के मुखौटे लेकर जा रहे हैं असम की सांस्कृतिक विरासत

 

असम के माजुली द्वीप की सदियों पुरानी मुखौटा कला एक बार फिर वैश्विक मंच पर अपनी पहचान बनाने जा रही है। ऐतिहासिक समागुरी सत्र में तैयार किए गए पारंपरिक मुखौटे अब अमेरिका की यात्रा पर निकलने वाले हैं, जहाँ वे असम की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रतिनिधित्व करेंगे।

जब भी असम की पारंपरिक मुखौटा निर्माण कला का उल्लेख होता है, माजुली का नाम स्वतः ही सामने आ जाता है। विश्व के सबसे बड़े नदी द्वीप के रूप में प्रसिद्ध माजुली न केवल अपनी आध्यात्मिक परंपराओं के लिए जाना जाता है, बल्कि अपनी अद्वितीय शिल्पकला के कारण भी विशेष पहचान रखता है। इस विरासत के केंद्र में स्थित है समागुरी सत्र, जिसने सदियों से मुखौटा निर्माण की परंपरा को जीवित रखा है।

महान संत, समाज सुधारक और सांस्कृतिक द्रष्टा श्रीमंत शंकरदेव की रचनात्मक परंपरा से जुड़ी यह कला लंबे समय से असम और माजुली की सांस्कृतिक पहचान को दुनिया के सामने प्रस्तुत करती रही है। भाओना नाट्य प्रस्तुतियों में उपयोग होने वाले ये मुखौटे केवल कलात्मक वस्तुएँ नहीं हैं, बल्कि असम की धार्मिक, सांस्कृतिक और लोक परंपराओं के जीवंत प्रतीक हैं।

समागुरी सत्र की मुखौटा कला का उल्लेख आते ही प्रसिद्ध मुखौटा कलाकार हेम चंद्र गोस्वामी का नाम भी स्मरण हो उठता है। उनके नवाचारों और समर्पण ने इस पारंपरिक कला को नई ऊर्जा प्रदान की है। हल्के, अधिक अभिव्यंजक और कलात्मक रूप से समृद्ध मुखौटों के माध्यम से उन्होंने न केवल इस शिल्प को विलुप्त होने से बचाया, बल्कि इसे अंतरराष्ट्रीय पहचान भी दिलाई।

अब जब समागुरी सत्र के मुखौटे अमेरिका पहुँचने की तैयारी में हैं, यह केवल एक कला प्रदर्शनी नहीं, बल्कि असम की जीवंत सांस्कृतिक विरासत की वैश्विक यात्रा है। यह अवसर दुनिया को यह दिखाने का है कि ब्रह्मपुत्र के किनारे जन्मी यह अनूठी परंपरा आज भी उतनी ही सशक्त, प्रासंगिक और प्रेरणादायक है जितनी सदियों पहले थी।

मुखौटे लंबे समय से भाओना परंपरा का अभिन्न हिस्सा रहे हैं। 15वीं शताब्दी के महान संत, समाज सुधारक और विद्वान श्रीमंत शंकरदेव द्वारा शुरू की गई इस नाट्य परंपरा ने असम की नव-वैष्णव संस्कृति की नींव रखी। इन प्रस्तुतियों में देवताओं, राक्षसों, पशुओं और हिंदू महाकाव्यों के विभिन्न पात्रों को दर्शाने के लिए भव्य मुखौटों का उपयोग किया जाता है।

350 वर्षों से भी अधिक समय से समागुरी सत्र इस अनूठी कला का प्रमुख केंद्र रहा है। हेम चंद्र गोस्वामी ने यह कला अपने पिता रुद्र कांता गोस्वामी से सीखी। उस समय तक असम के कई अन्य सत्रों में मुखौटा निर्माण की यह परंपरा लगभग समाप्त हो चुकी थी।

गोस्वामी ने समझ लिया था कि इस कला का भविष्य केवल परंपरा को बचाए रखने में नहीं, बल्कि समय के साथ उसे विकसित करने में भी है। इसी सोच के साथ उन्होंने वर्ष 2000 के आसपास नई तकनीकों और प्रयोगों पर काम शुरू किया। उनका उद्देश्य मुखौटों को हल्का, अधिक आरामदायक और अधिक अभिव्यंजक बनाना था। पारंपरिक मुखौटे कई किलो वज़नी होते थे, जिन्हें लंबे समय तक पहनकर अभिनय करना कलाकारों के लिए कठिन होता था।

बांस, कपड़े और मिट्टी-गोबर के मिश्रण जैसी हल्की सामग्रियों के उपयोग से उन्होंने ऐसे मुखौटे तैयार किए जिनका वजन केवल लगभग 500 ग्राम रह गया। इन्हें बनाने में भी मात्र चार से पांच दिन लगते हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने चलने वाले जबड़ों और आंखों वाले मुखौटों का विकास किया, जिससे कलाकार मंच पर भावनाओं को अधिक प्रभावशाली ढंग से व्यक्त कर सकें।

इन नवाचारों ने न केवल भाओना प्रस्तुतियों को अधिक जीवंत बनाया, बल्कि आम लोगों के बीच भी इस कला के प्रति नई रुचि पैदा की। घरों की सजावट के लिए बनाए जाने वाले मुखौटों ने इस परंपरा को नई पहचान दिलाई, जबकि इसकी सांस्कृतिक जड़ों को भी सुरक्षित रखा।

आधुनिक प्रयोगों के बावजूद गोस्वामी ने इस कला की प्रामाणिकता से कभी समझौता नहीं किया। अत्यधिक व्यावसायीकरण को रोकने के लिए मुखौटे केवल समागुरी सत्र से ही उपलब्ध कराए जाते हैं, जिससे यह परंपरा अपनी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत से जुड़ी रहती है।

असम की इस अनूठी कला को अंतरराष्ट्रीय पहचान तब मिली जब 2016 में ब्रिटिश म्यूज़ियम, लंदन ने अपनी प्रदर्शनी कृष्णा इन गार्डन ऑफ असम में गोस्वामी द्वारा निर्मित पांच मुखौटों को प्रदर्शित किया। इस प्रदर्शनी ने दुनिया भर के दर्शकों को ब्रह्मपुत्र के किनारे पीढ़ियों से जीवित इस परंपरा से परिचित कराया।

आज हेम चंद्र गोस्वामी का कार्य इस बात का सशक्त उदाहरण है कि परंपरा और नवाचार साथ-साथ आगे बढ़ सकते हैं। एक विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुकी कला में नई जान फूंककर उन्होंने यह सुनिश्चित किया है कि असम के प्रतिष्ठित मुखौटे आने वाली पीढ़ियों और दुनिया भर के दर्शकों को प्रेरित करते रहें।

मुखौटा निर्माण की इस पारंपरिक कला को संरक्षित करने और उसमें नई जान फूंकने के उनके असाधारण योगदान के लिए हेम चंद्र गोस्वामी को भारत के चौथे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म श्री से सम्मानित किया गया।

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