पश्चिम बंगाल के कृष्णनगर की 79 वर्षीय रेवा पाल प्राकृतिक रंगों और बारीक चित्रकारी के माध्यम से दुर्गा पूजा की पारंपरिक चालचित्र कला को सहेज रही हैं। जीवन के संघर्षों, आर्थिक कठिनाइयों और बढ़ती उम्र के बावजूद उनका कला के प्रति समर्पण बंगाल की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को जीवित रखने की एक प्रेरक कहानी है।
दुर्गा पूजा की भव्यता के पीछे छिपी कला की एक अनकही कहानी
शरद ऋतु के आगमन के साथ ही बंगाल की हवाओं में शिउली के फूलों की मनमोहक सुगंध घुलने लगती है। गलियों और मोहल्लों में ढाक की थाप गूंजने लगती है, कुम्हारों और मूर्तिकारों की कार्यशालाओं में मां दुर्गा की भव्य प्रतिमाएं आकार लेने लगती हैं और पूजा पंडाल रंगों, रोशनी तथा सजावट से जीवंत हो उठते हैं। हर ओर उत्सव का उल्लास दिखाई देता है। मां दुर्गा की बड़ी-बड़ी आंखें, सजीव मुखाकृति, अलंकृत आभूषण और दिव्य स्वरूप लोगों को अपनी ओर आकर्षित करते हैं।
लेकिन इस भव्यता के बीच एक ऐसी कला भी है, जो मां दुर्गा की प्रतिमा को पूर्णता प्रदान करती है, फिर भी अक्सर लोगों की नजरों से ओझल रह जाती है। यह है चालचित्र—एक पारंपरिक चित्रकला, जिसमें देवी की प्रतिमा के पीछे सजाए जाने वाले पृष्ठपट पर पौराणिक कथाओं, देवी-देवताओं और धार्मिक प्रसंगों को बेहद बारीकी से उकेरा जाता है।
पश्चिम बंगाल के नदिया जिले के कृष्णनगर में 79 वर्षीय रेवा पाल इसी पारंपरिक कला को अपने रंगों और तूलिका के माध्यम से जीवित रखे हुए हैं। प्राकृतिक रंगों, वर्षों के अनुभव और अटूट धैर्य के साथ वह ऐसे चित्र बनाती हैं, जो दुर्गा पूजा की परंपरा को एक विशिष्ट कलात्मक पहचान देते हैं।

रेवा पाल की कहानी केवल एक कलाकार की कहानी नहीं है। यह संघर्षों के बीच अपने हुनर को बचाए रखने, विपरीत परिस्थितियों में आत्मनिर्भर बने रहने और पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत के प्रति समर्पण की कहानी भी है।
16 वर्ष की उम्र में विवाह, 18 वर्ष में परिवार की जिम्मेदारी
रेवा पाल का पारंपरिक कला से जुड़ाव विवाह के बाद शुरू हुआ। महज 16 वर्ष की उम्र में उनका विवाह पटचित्र कलाकार जोष्टी पाल से हुआ। दो वर्ष बाद, जब वह 18 वर्ष की थीं, उन्होंने परिवार की आर्थिक मदद के लिए कला के काम में हाथ बंटाना शुरू कर दिया।
धीरे-धीरे चित्रकारी उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गई। पति के साथ काम करते हुए उन्होंने इस कला की बारीकियों को सीखा और अपने अनुभव को समृद्ध किया। दोनों ने अपनी कला के सहारे चार बच्चों का पालन-पोषण किया। उनके लिए चित्रकारी केवल रचनात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं थी, बल्कि परिवार के जीवनयापन का आधार भी थी।
समय बीतने के साथ यह काम उनके जीवन की पहचान बन गया। रंगों और रेखाओं के बीच उन्होंने परिवार की जिम्मेदारियां निभाईं और उस परंपरा से अपना रिश्ता मजबूत किया, जिसकी जड़ें बंगाल की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत में गहराई तक फैली हुई हैं।
लेकिन जीवन ने उनके सामने कठिन परीक्षा तब रखी, जब लगभग दो दशक पहले उनके पति का निधन हो गया। आर्थिक परेशानियों के बीच परिवार की जिम्मेदारी अब उनके कंधों पर थी। ऐसे समय में उन्होंने उस कला का साथ नहीं छोड़ा, जिसे उन्होंने अपने पति के साथ सीखा और साधा था।
उन्होंने चित्रकारी जारी रखी और इस पारंपरिक विरासत को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया। उम्र और परिस्थितियों की चुनौतियों के बावजूद उनका कला से जुड़ाव बना रहा।
चालचित्र: मां दुर्गा की प्रतिमा के पीछे सजी पौराणिक दुनिया
बंगाल की दुर्गा पूजा में चालचित्र का विशेष स्थान है। यह देवी दुर्गा की प्रतिमा के पीछे लगाया जाने वाला चित्रित पृष्ठपट होता है, जो अपनी कलात्मक संरचना और पौराणिक विषयों के कारण प्रतिमा की सुंदरता को एक अलग आयाम देता है।
चालचित्र पर पुराणों से जुड़ी कथाएं, भगवान शिव और माता पार्वती, मां काली तथा भगवान विष्णु के दशावतार जैसे धार्मिक विषय चित्रित किए जाते हैं। इन चित्रों में बारीक आकृतियों, पारंपरिक अलंकरणों और रंगों का ऐसा संयोजन दिखाई देता है, जो दर्शकों को भारतीय पौराणिक परंपराओं की एक चित्रमय दुनिया में ले जाता है।
इस कला को तैयार करना आसान नहीं है। प्रत्येक आकृति, रेखा और अलंकरण को सावधानीपूर्वक उकेरना पड़ता है। लंबे समय तक एकाग्र होकर काम करने के साथ-साथ कलाकार को रंगों और रचनाओं के संतुलन का भी ध्यान रखना होता है।
प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल इस पारंपरिक कला को उसकी विशिष्ट पहचान देता है। पीढ़ियों से कलाकार अपने अनुभव और कौशल के माध्यम से इन तकनीकों को आगे बढ़ाते आए हैं। इस तरह चालचित्र केवल सजावट का माध्यम नहीं, बल्कि बंगाल की धार्मिक आस्था, लोककला और सांस्कृतिक स्मृतियों का भी वाहक है।
विडंबना यह है कि दुर्गा पूजा के दौरान जब भव्य प्रतिमाओं और विशाल पंडालों की चर्चा होती है, तब उन्हें पूर्णता देने वाले चालचित्र कलाकारों का योगदान कई बार पीछे छूट जाता है। उनकी मेहनत उत्सव की सुंदरता में समाहित तो हो जाती है, लेकिन कलाकारों को हमेशा उसके अनुरूप पहचान नहीं मिल पाती।
उम्र से बड़ी कला के प्रति निष्ठा
79 वर्ष की उम्र में भी इस कला को साधते रहना रेवा पाल के लिए आसान नहीं है। चालचित्र बनाने में बारीक चित्रकारी, एकाग्रता और पैनी दृष्टि की आवश्यकता होती है। लंबे समय तक बैठकर काम करना भी शारीरिक रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
इसके बावजूद रेवा का अपनी कला से रिश्ता बना हुआ है। बढ़ती उम्र और आर्थिक कठिनाइयां उनके जीवन की वास्तविकताएं हैं, लेकिन उन्होंने अपने हुनर को छोड़ने का रास्ता नहीं चुना।
उनकी यात्रा उन अनेक पारंपरिक कलाकारों की याद दिलाती है, जिनके पास पीढ़ियों से संजोया हुआ कौशल तो है, लेकिन जिनके लिए अपनी कला के सहारे स्थिर आजीविका अर्जित करना हमेशा आसान नहीं होता। बदलते बाजार, आधुनिक सजावट के नए तौर-तरीके और पारंपरिक हस्तशिल्प को मिलने वाले सीमित अवसर इन कलाकारों के सामने कई चुनौतियां खड़ी करते हैं।
ऐसे में किसी कला को जीवित रखना केवल कलाकार की व्यक्तिगत इच्छाशक्ति का प्रश्न नहीं रह जाता। इसके लिए समाज की सराहना, कला के लिए उचित बाजार, कलाकारों को सम्मानजनक पारिश्रमिक और नई पीढ़ी की भागीदारी भी आवश्यक है।
रेवा पाल का निरंतर काम करना इस बात का उदाहरण है कि सांस्कृतिक विरासत केवल पुस्तकों, संग्रहालयों या उत्सवों में सुरक्षित नहीं रहती। वह उन लोगों के हाथों में जीवित रहती है, जो कठिन परिस्थितियों में भी अपनी परंपरा का अभ्यास जारी रखते हैं।
परंपरा को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की जरूरत
बंगाल की चालचित्र कला को संरक्षित करने के लिए आवश्यक है कि इसे दुर्गा पूजा की सजावट का एक हिस्सा भर न माना जाए, बल्कि एक स्वतंत्र और महत्वपूर्ण लोककला के रूप में भी पहचान मिले।
पारंपरिक कलाकारों की कृतियों को प्रदर्शनियों और सांस्कृतिक आयोजनों में स्थान देना, उन्हें अपने काम के लिए बेहतर बाजार उपलब्ध कराना तथा युवाओं को इस कला को सीखने के अवसर देना इसकी निरंतरता के लिए महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।
दुर्गा पूजा जैसे विश्वविख्यात सांस्कृतिक उत्सव के माध्यम से इस कला को व्यापक पहचान दिलाई जा सकती है। जब लोग मां दुर्गा की प्रतिमा की सुंदरता की प्रशंसा करें, तब उसके पीछे बने चालचित्र और उसे तैयार करने वाले कलाकारों की मेहनत को भी याद किया जाना चाहिए।
79 वर्ष की उम्र में रेवा पाल की यात्रा हमें याद दिलाती है कि किसी परंपरा का जीवित रहना केवल उसके गौरवशाली अतीत पर निर्भर नहीं करता। उसके लिए वर्तमान में भी ऐसे लोगों की आवश्यकता होती है, जो उसे अपने जीवन का हिस्सा बनाए रखें।
कृष्णनगर की रेवा पाल आज भी रंगों और रेखाओं के माध्यम से बंगाल की इस सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ा रही हैं। उनके लिए हर चित्र केवल एक कलाकृति नहीं, बल्कि जीवन के अनुभवों, संघर्षों और अपनी कला के प्रति अटूट निष्ठा की अभिव्यक्ति है।
दुर्गा पूजा के हर पंडाल में सजी मां की प्रतिमा के पीछे ऐसी ही अनेक अनकही कहानियां छिपी होती हैं। रेवा पाल की कहानी उनमें से एक है—एक ऐसी कलाकार की कहानी, जिसकी मेहनत भले ही अक्सर पर्दे के पीछे रह जाती हो, लेकिन जिसकी कला उत्सव की सुंदरता और परंपरा को जीवंत बनाए रखती है।
हर चित्र के साथ रेवा पाल केवल चालचित्र नहीं बनातीं, बल्कि बंगाल की एक अमूल्य सांस्कृतिक परंपरा को आने वाले कल तक पहुंचाने का प्रयास करती हैं।


