आठ साल की उम्र में अंजलि की आंखों की रोशनी चली गई। लेकिन आज वह भगवान गणेश, शिव और अन्य देवी-देवताओं की बारीक मूर्तियां बनाती हैं—उन्हें देखकर नहीं, बल्कि अपनी उंगलियों से हर आकार, घुमाव और बारीकी को महसूस करके।
अंजलि की कहानी तब शुरू हुई, जब उनके परिवार ने महसूस किया कि उनकी नजर धीरे-धीरे कमजोर होती जा रही है। बचपन में अंजलि खुद नहीं समझ पाती थीं कि उनके साथ क्या हो रहा है। लेकिन जब वह दीवारों और आसपास की चीजों से टकराने लगीं, तो परिवार को स्थिति की गंभीरता का एहसास हुआ।
इलाज हुआ, ऑपरेशन हुआ और इस उम्मीद में कई प्रयास किए गए कि उनकी आंखों की रोशनी वापस आ जाएगी। लेकिन समय के साथ उनकी आंखों की नसों ने काम करना बंद कर दिया। बाद में डॉक्टरों ने परिवार को बताया कि उनकी दृष्टि वापस लाने का कोई उपचार संभव नहीं है।
लेकिन अंजलि ने अपनी दृष्टि खोई, अपनी सृजनात्मकता नहीं।
जब स्पर्श बना देखने का माध्यम
बचपन में अंजलि ने मिट्टी के दीये बनाने शुरू किए। इसके बाद उन्होंने मिट्टी से खिलौने बनाने का प्रयोग किया। धीरे-धीरे उन्हें महसूस हुआ कि उनकी उंगलियां उन आकारों और आकृतियों को समझ सकती हैं, जिन्हें उनकी आंखें अब नहीं देख सकती थीं।
मंदिरों में जाने से उनके भीतर एक नई रचनात्मक प्रेरणा पैदा हुई। उन्होंने भगवान गणेश, भगवान शिव और अन्य देवी-देवताओं की मूर्तियां बनाना शुरू किया।
अंजलि के लिए मूर्तिकला पूरी तरह स्पर्श पर आधारित प्रक्रिया है। वह मूर्ति को आकार लेते हुए देख नहीं सकतीं, इसलिए उसकी बनावट, अनुपात और बारीकियों को समझने के लिए अपनी उंगलियों पर निर्भर रहती हैं। मिट्टी को आकार देने से पहले वह हर घुमाव, आभूषण और चेहरे की विशेषता को स्पर्श के माध्यम से महसूस करती हैं।

जो काम किसी दृष्टि पर निर्भर व्यक्ति के लिए कठिन लग सकता है, वह अंजलि के लिए स्पर्श की सहज समझ का हिस्सा बन गया।
‘अगर एक सामान्य व्यक्ति कुछ कर सकता है, तो मैं भी कर सकती हूं’
अंजलि की यात्रा केवल मूर्तियां बनाने की कहानी नहीं है। यह उन धारणाओं को चुनौती देने की कहानी भी है, जो अक्सर किसी दिव्यांग व्यक्ति की क्षमताओं को सीमित मान लेती हैं।
एक समय लोगों ने उनसे कहा कि दृष्टिहीन होने के कारण वह कई काम स्वतंत्र रूप से नहीं कर सकतीं। लेकिन अंजलि ने इस सोच को स्वीकार करने के बजाय उसे चुनौती देने का फैसला किया।
उन्होंने खुद से कहा, “अगर एक सामान्य व्यक्ति कुछ कर सकता है, तो मैं भी कर सकती हूं।”
यह विश्वास उनके लिए ताकत बन गया। परिवार और समुदाय से मिले प्रोत्साहन के साथ अंजलि लगातार अपनी कला का अभ्यास करती रहीं और उसे बेहतर बनाती गईं।
समय के साथ उनके हाथ ही उनके सबसे महत्वपूर्ण कलात्मक साधन बन गए। इन्हीं हाथों से वह मिट्टी को ऐसी आकृतियों में बदलने लगीं, जिन्हें देखकर लोग उनकी कला की सराहना करते हैं।
उनकी कला यह याद दिलाती है कि रचनात्मकता हमेशा आंखों की मोहताज नहीं होती। अंजलि के लिए स्पर्श एक अलग भाषा बन गया है—एक ऐसी भाषा, जिसके माध्यम से वह आकार को समझती हैं, अपनी आस्था को अभिव्यक्त करती हैं और कला को जन्म देती हैं।
सिर्फ एक कलाकार नहीं
अंजलि की कहानी केवल मूर्तियां बनाने की कहानी नहीं है। यह इस बात की कहानी है कि किसी दिव्यांगता को अपने जीवन की सीमाएं तय करने देने से इनकार कैसे किया जा सकता है।
बचपन में उन्होंने अपनी आंखों की रोशनी खो दी, लेकिन जिज्ञासा और कुछ नया बनाने की इच्छा नहीं खोई। साधारण दीयों और मिट्टी के खिलौनों से शुरू हुई उनकी यात्रा धीरे-धीरे स्पर्श पर आधारित एक विशिष्ट कला में बदल गई।
आज जब अंजलि मिट्टी का एक टुकड़ा हाथों में लेती हैं, तो उन्हें यह देखने की जरूरत नहीं होती कि वह क्या बना रही हैं। उन्हें भरोसा होता है कि उनके हाथ जानते हैं कि उन्हें क्या करना है।
उनकी यात्रा उस आम धारणा को चुनौती देती है कि किसी एक क्षमता के खो जाने का अर्थ सृजन की क्षमता का खत्म हो जाना है।
अंजलि के लिए इसका अर्थ केवल इतना था कि उन्हें सृजन का एक नया रास्ता खोजना था।
उनके हाथ उनकी आंखें बन गए। मिट्टी उनका कैनवास बन गई। और उससे उभरने वाली हर मूर्ति केवल एक कलाकृति नहीं, बल्कि संघर्ष, कल्पना, आस्था और उन बाधाओं के बावजूद आगे बढ़ने के संकल्प की कहानी बन गई, जिन्हें जीवन ने उनके सामने रखा।



