Archive - pravasisamwad

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‘क्या ज़रूरी था, दाढ़ तोड़ के जाना तेरा, माना, तू नरमदिल न हुआ, ठेकुआ मेरा.’

December 30, 2025
आनंदवर्धन ओझा बिहारी भारत के किसी कोने में रहे,वह अपनी प्रवृत्ति से विवश रहता है. गर्मियों में उसे चाहिए आम-लीची-बेल, हर मौसम में सत्तू,
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