विविध Archives | Page 11 of 19 | Pravasi Samwad
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विविध - Page 11

फगुनाहट

अब न मदनोत्सव मनाया जाता है, न होली में वो हुड़दंग बचा है, न फगुनाहट में वो रस। जिंदा रहने

बनारस की बसंत पंचमी

बनारस एक ऐसा शहर है जहाँ इतिहास अपने सम्पूर्ण वैभव के साथ वर्तमान से मिलता है और वर्तमान भी उदार

हरिवंश राय ‘बच्चन’ जयंती विशेष

मधुशाला मेरी समझ में अपने आप में सम्पूर्ण, एक व्यापक जीवन दर्शन है  और कई बार हाला अपने शाब्दिक अर्थ की परिसीमा को  लाँघकर लाक्षणिक अर्थ ग्रहण कर लेती है।  कई बार वह विशुद्ध हाला ही रहती है, लोग चाहे उसकी

देव दीपावली की वो शाम …

..उन बंगाली मित्र के प्रति मेरे मन में प्रेम और श्रद्धा ऐसा नहीं है कि अब आई हो। देव दीपावली की शाम से पूर्व ही उन्होंने हमसे कहा कि उनकी सखी और उसकी कुछ सहेलियां भी देव दीपावली देखने की आकांक्षी हैं और भीड़ के भय से वे हमारे साथ आना चाहती हैं।बस वो दिन है और आज का दिन है, उसके प्रति मेरे मन में  प्रेम बना हुआ है। PRAVASISAMWAD.COM जब कभी भी मैं गुलाम अली साहब का गाना “चुपके-चुपके रात दिन… ” सुनता हूँ तो मुझे अपने

बनारस इश्क है

यह शहर भौगोलिक इकाई मात्र नहीं है बल्कि एक मिज़ाज है, एक मौज है,  एक अल्हड़ मस्ती है, एक बेफिक्री है और सबसे उपर एक रस है PRAVASISAMWAD.COM समुद्र मंथन से निकले विष को सहर्ष पी लेना और उसके बाद अमरत्व पा जाना, यह बस

दास्तान-ए-इश्क़ भाग #8

मैं इश्क़ के मैदान में हार गया और इस हार के साथ ही विवाह कर के इस मैदान से हट गया, तो बस दास्तान-ए-इश्क़ यहीं ख़त्म हुआ और इसके साथ ख़त्म हुआ ज़िन्दगी का एक खुशनुमा पहलू  PRAVASISAMWAD.COM कूचा-ए-जाना से निकाले लोग अक्सर मयकदे में जाते हैं l मैं मयकदे बहुत पहले आ गया था और

दास्तान-ए-इश्क़ भाग #7

इश्क़ में हर पटाक्षेप के बाद भी हल्की सी टीस रह ही जाती है, विशेषकर तब जब आपका महबूब गुज़रते वक़्त के साथ सुंदर होता जाए।समझा जाए तो वो ताजमहल होती गई और मैं अपने तमाम ज्ञान के साथ नालंदा विश्वविद्यालय का खंडहर PRAVASISAMWAD.COM गया एक महान तीर्थ है, मोक्षधाम है।  मोक्ष हिन्दू धर्म की मान्यताओं में आत्मा की सर्वोत्तम परिणति है। जीवित व्यक्ति के लिए गया अभी भी तीर्थ गयाजी कम और गयासुर राक्षस अधिक है। फिर भी जिस-तिस प्रकार गया प्रवास पूरा हुआ। One who is down, fears no fall के पाश्चात्य ज्ञान के आधार पर मैंने भाग्य को चुनौती दी थी कि अब गया से गई बीती जगह पर मेरा तबादला क्या होगा? भाग्य ने चुनौती स्वीकार की और मेरे पदस्थापन रक्सौल हुआ। रक्सौल भारत-नेपाल सीमा पर अवस्थित एक स्थान है जिसे आप अपनी स्वेच्छा और सुविधा के हिसाब से गाँव, शहर, कस्बा अथवा नरक कह सकते हैं। धूमिल ने कहीं लिखा है : ‘जहन्नुम कचहरी से चल रहा है’, नर्क से न सही न्यायालय से परिचित हूँ और चित हूँ। इसी तर्ज पर मैं भी कह सकता हूँ कि नर्क से न सही रक्सौल से परिचित हूँ और चित हूँ। जाम, ट्रैफिक, गंदगी, भ्रष्टाचार आदि तमाम यातनाएँ इस स्थान का परिचय हैं। हल्की फुहार के बाद ही आपको पता न चलता कि सड़क पर कीचड़ है अथवा आप किसी विशाल नाले में हैं। वैसे रक्सौल नाम की व्युत्पत्ति का एक रोचक मौखिक इतिहास सुना। “अंग्रेज अधिकारी लगान वसूल करने जब रक्सौल जाते तो यहाँ के निवासी भागकर नेपाल चले जाते, फिर जब वे लौट जाते तो वे पूर्ववत रक्सौल चले आते। ऐसा जब एकाधिक बार हो गया, तो अंग्रेज़ अधिकारी ने खीझ और झुंझलाहट में कहा रास्कल्स। रक्सौल उसी रास्कल्स का भोजपुरी अपभ्रंश है।” मैं इसकी पुष्टि नहीं करता, पर अब तो समाचार-पत्र से लेकर अन्य माध्यम तक अपुष्ट जानकारी देते ही रहते हैं, ऐसे में TRP के लिहाज से महत्त्वपूर्ण और रोचक तथ्य अपुष्ट होने पर भी साझा किए ही जा सकते हैं। यह हमारे यहाँ चलन में है, जल्द ही झूठ हमारी परंपरा का हिस्सा होगी। रक्सौल में मेरा इश्क़ दूरसंचार से चल रहा था। फ़िराक था सो खूब शराब पी जा रही थी और खूब शायरी पढ़ी जा रही थी। मैंने इज़हार-ए-मोहब्बत कई बार किया पर उसने हर बार टाल दिया। न इक़रार, न इनकार। मेरी हालत उस परीक्षार्थी की तरह थी जिसकी परीक्षा खराब गई थी मगर मात्र भाग्य और भगवान के भरोसे उत्तीर्ण होने की हल्की उम्मीद भी थी। यह स्थिति बड़ी कठिन होती है। हम रोज़ बात करते, पर इस सवाल पर वो कन्नी काट जाया करती। मुझे समझ लेना चाहिए था, जो कि मैंने कुछ विलम्ब से किया, कि वह “न ब्रूयात अप्रियं सत्यं” के मधुर सनातन सिद्धान्त पर चल रही थी। अहमद फ़राज़ के इस शेर इससे पहले कि बेवफा हो जाएँ, क्यों न ए दोस्त हम जुदा हो जाएँ तू भी हीरे से बन गया पत्थर, हम भी कल जाने क्या से क्या हो जाएँ से हमने इस कहानी का भी पटाक्षेप किया। इश्क़ में हर पटाक्षेप के बाद भी हल्की सी टीस रह ही जाती है, विशेषकर तब जब आपका महबूब गुज़रते वक़्त के साथ सुंदर होता जाए। समझा जाए तो वो ताजमहल होती गई और मैं अपने तमाम ज्ञान के साथ नालंदा विश्वविद्यालय का खंडहर। क्रमशः…
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