September 4, 2025
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कैसे राजकुमारी अक्षिता भंज देव भारत की शाही विरासत को नए युग में सजीव कर रही हैं

भारत की रियासतों की ढलती शान और खंडहर बनते महलों के बीच जन्मी मयूरभंज की राजकुमारी अक्षिता भंज देव अक्सर अपनी जिंदगी की तुलना Downton Abbey से करती हैं। भंज वंश की वंशज और नेपाल के पूर्व राजा त्रिभुवन की परनातिन, अक्षिता इतिहास से समृद्ध वंश परंपरा लेकर आई हैं। लेकिन उनकी सोच भविष्य पर केंद्रित है—जहाँ विरासत और सामाजिक उद्यमिता का संगम है।

कोलकाता में पली-बढ़ीं अक्षिता ने ला मार्टिनियर फॉर गर्ल्स से शिक्षा ली और फिर यूनाइटेड वर्ल्ड कॉलेज ऑफ साउथ ईस्ट एशिया, सिंगापुर पहुँचीं। एक राष्ट्रीय स्तर की अश्वारोही खिलाड़ी, उन्होंने अमेरिका के बार्ड कॉलेज में डेविस स्कॉलर के रूप में दाखिला लिया, जहाँ राजनीति विज्ञान और मानवाधिकार का अध्ययन किया और संघर्ष क्षेत्रों में मीडिया पर विशेष ध्यान दिया। स्नातक के बाद, वे न्यूयॉर्क चली गईं, जहाँ इंटरनेशनल रेस्क्यू कमिटी के साथ काम करते हुए उन्होंने संचार, ब्रांड प्रबंधन और उद्यमिता के क्षेत्र में अनुभव अर्जित किया।

आज वे अपने शाही अतीत और भारत के ग्रामीण विकास के बीच एक सेतु की तरह खड़ी हैं।

अपनी बहन मृणालिका के साथ अक्षिता 200 साल पुराने बेलगड़िया पैलेस की निदेशक हैं। कभी इतिहास की धुंधली यादों में खोया यह महल आज ईको–टूरिज्म और सामाजिक उद्यमिता का जीवंत केंद्र बन चुका है।

 

“हमने अपने पुश्तैनी घर का पुनर्निर्माण इस सोच के साथ किया कि पर्यटन, ओडिशा के सबसे बड़े जिले मयूरभंज के सतत विकास का माध्यम बने,” वे बताती हैं। अब यह पैलेस निवेश आकर्षित करने और स्थानीय छोटे एवं मझोले उद्यमों में संसाधन पहुँचाने का मंच बन गया है।

महल में आने वाले मेहमानों के सहयोग से दोनों बहनों ने मयूरभंज फाउंडेशन की स्थापना की, जो स्वास्थ्य, शिक्षा, आजीविका, कला, संस्कृति और खेल के क्षेत्रों में कार्यरत है और 2025 तक कम से कम 10,000 लोगों के जीवन को सकारात्मक रूप से प्रभावित करने का लक्ष्य रखती है।

अक्षिता और उनकी टीम ने स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर उन्हें ईको-टूरिज्म और हस्तशिल्प के बाजार से जोड़ते हुए सशक्त बनाया। प्रोजेक्ट छावनी के छऊ नृत्य प्रदर्शन से लेकर ORMAS के सबई घास SHG समूहों तक, इन पहलों ने न केवल वैकल्पिक आजीविका दी बल्कि विरासत को भी संजोया।

2019 से, बेलगड़िया पैलेस में 1,000 से अधिक मेहमान आए और 500+ हेरिटेज टूर, 100 से अधिक कारीगर मुलाकातें और कई कलाकार निवास कार्यक्रम आयोजित हुए। मेहरानगढ़ फोर्ट म्यूजियम (टाटा ट्रस्ट्स) और अन्य वैश्विक संस्थाओं के साथ साझेदारी ने इनके प्रभाव को और गहरा किया।

बहनों ने खेल पहलों के माध्यम से आदिवासी युवाओं का भी सहयोग किया है खेल उपकरण जुटाए, प्रशिक्षण कार्यशालाएँ आयोजित कीं, खासकर सिमलीपाल टाइगर रिज़र्व के आसपास रहने वाले समुदायों के लिए, जो पारिस्थितिक चुनौतियों से जूझते हैं।

मयूरभंज से आगे बढ़कर अक्षिता, दसरा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। यहाँ वे गिविंगपी (GivingPi) का संचालन करती हैं, भारत का पहला पारिवारिक परोपकार नेटवर्क, जो 2022 में शुरू हुआ। अब तक इस पहल ने 300 मिलियन डॉलर से अधिक जुटाकर 100 मिलियन से अधिक लोगों को प्रभावित किया है। इसके फाउंडर्स सर्कल में निखिल कामत, निसाबा गोदरेज और रोहिणी निलेकणी जैसे प्रमुख परोपकारी शामिल हैं।

उनका पूर्व अनुभव वाधवानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस संस्थान में भी रहा, जहाँ उन्होंने आपदा-प्रवण राज्यों जैसे ओडिशा में स्वास्थ्य समाधान पर विशेष ध्यान दिया।

अपनी उपलब्धियों के बावजूद अक्षिता मानती हैं कि ग्रामीण क्षेत्र में एक पारिवारिक विरासत होटल चलाना आसान नहीं है। कुशल टीम को ढूँढना और बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती है।

“ऐसे उद्यमशील लोगों को पाना कठिन है जो बदलाव के लिए खुले हों और ग्रामीण इलाकों में समुदाय के दूत बन सकें,” वे कहती हैं। “लेकिन सही टीम में निवेश और पेशेवरों को सशक्त करना इस यात्रा को संभव बनाता है।”

काम से इतर, वे खेल, फिटनेस, और रचनात्मक संवादों में सक्रिय रहती हैं। हाल ही में वियतनाम और नेपाल की यात्रा से लौटीं, जहाँ एशिया के छुपे खज़ानों ने उन्हें प्रेरित किया।

अक्षिता का मानना है कि भारत की आदिवासी संस्कृति, शिल्प और आवाज़ों को वैश्विक विरासत की मुख्यधारा में लाना ही असली लक्ष्य है। उनकी दृष्टि है कि मयूरभंज फाउंडेशन एक आत्मनिर्भर कोष बनाए, जो हर वर्ष आदिवासी युवाओं को रोजगार और कौशल प्रदान करे और भारतीय शिल्पकला को वैश्विक मंच पर पहुँचाए।

महलों से परोपकार तक, शाही वंश से ग्रामीण विकास तक राजकुमारी अक्षिता भंज देव वास्तव में एक ग्लोबल इंडियन का सार प्रस्तुत करती हैं विरासत में जड़ें जमाए हुए, लेकिन उद्देश्यपूर्ण भविष्य गढ़ती हुईं।

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