लुप्तप्राय लोक कला 'चित्तारा' को संजोने के लिए प्रतिबद्ध कलाकार | Pravasi Samwad
August 12, 2025
7 mins read

लुप्तप्राय लोक कला ‘चित्तारा’ को संजोने के लिए प्रतिबद्ध कलाकार

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ वर्ल्ड कल्चर (IIWC) में प्रदर्शित दीवारु कलाकार श्रुति की पारंपरिक ‘हसे चित्तारा’ पेंटिंग एक विवाह समारोह को दर्शाती है। इसमें संगीतकारों, सूर्य-चंद्र और दोनों कोनों में पक्षियों के चित्रित रूपांकन शामिल हैं।

चित्तारा (हसे चित्र) कर्नाटक के मालनाड क्षेत्र विशेषकर शिमोगा, सागर और उत्तर कन्नड़ जिलों मे बसे दीवारु समुदाय द्वारा सदियों से प्रचलित एक लुप्तप्राय लोक कला है।

यह लोक कला दीवारों, ट्रे, बांस या फाइबर की टोकरी पर बनाई जाने वाली बारीक ज्यामितीय आकृतियों पर आधारित है और दीवारु समुदाय की संस्कृति व परंपराओं में गहराई से रची-बसी है।

सूक्ष्म विवरण, रंग संयोजन और पूर्ण संतुलन पर विशेष ध्यान देने वाली यह कला धरती और उसके तत्वों को श्रद्धांजलि है। साथ ही यह समुदाय की पर्यावरण के प्रति सम्मानजनक और सतत जीवनशैली का प्रमाण भी है, ऐसा मानती हैं गीता भट, द सेंटर फॉर रिवाइवल ऑफ इंडिजिनस आर्ट (CFRIA) की संस्थापक। यह एनजीओ वर्षों से चित्तारा कला को पुनर्जीवित, संरक्षित और बढ़ावा देने के साथ-साथ इस कला से जुड़े हजारों शिल्पकारों की मदद कर रही है।

गीता भट बताती हैं, “समुदाय का हर पहलू चाहे प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग का तरीका हो, उनके अनुष्ठान हों, या उनकी कला आज के समय में भी प्रासंगिक है, खासकर स्थिरता, पर्यावरण-मित्रता और प्रकृति के साथ सहयोग के संदर्भ में।”

यह लोक कला दीवारों, ट्रे, बांस या फाइबर की टोकरियों पर बारीक ज्यामितीय पैटर्न के रूप में रची जाती है। विषय अक्सर एकता और उत्सव से जुड़े होते हैं जैसे त्योहार या विवाह।

चार दिवसीय प्रदर्शनी में CFRIA ने मालनाड क्षेत्र के दीवारु समुदाय के साथ वर्षों की बातचीत से जुटाए गए अनुभव, झलकियां और जानकारी प्रस्तुत की। प्रदर्शनी का आयोजन बासवनगुड़ी स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ वर्ल्ड कल्चर में किया गया था।

गीता भट कहती हैं, “इस प्रदर्शनी में हमने दीवारु समुदाय के जीवन, संस्कृति और आजीविका का सच्चा प्रतिबिंब उनकी पारंपरिक लोक कला—चित्तारा—के माध्यम से पेश किया। यह 21 वर्षों के संवाद और तीन वर्षों के शोध व दस्तावेज़ीकरण का परिणाम है।”

यह प्रदर्शनी सिर्फ एक कला-प्रदर्शन नहीं थी; यह उन प्रवासी भारतीयों के लिए भी एक भावनात्मक सेतु बनी, जो वर्षों से अपने गांव-घर और परंपराओं से दूर हैं। इसने उन्हें अपनी जड़ों की याद दिलाई—जब त्योहारों में घर की दीवारों पर रंग-बिरंगी आकृतियां सजाई जाती थीं और हर रेखा में संस्कृति की धड़कन बसती थी।

गीता भट का मानना है कि चित्तारा केवल कला नहीं, बल्कि एक विरासत है, जिसे अगली पीढ़ियों चाहे वे भारत में हों या विदेश में तक पहुंचाना जरूरी है। CFRIA न केवल इस कला का संरक्षण कर रही है, बल्कि इससे जुड़े हजारों शिल्पकारों को आर्थिक और तकनीकी सहायता देकर उनका भविष्य भी संवार रही है।

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