India Archives | Page 393 of 415 | Pravasi Samwad
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India - Page 393

आइए अब ऑक्सीजन की फसल उगाएँ!

ऑक्सीजन खोजने वालों ने उस समय इसे मात्र प्राणवायु समझा। अर्थात समस्त प्राणियों के जीवन का आधार। किंतु उन्हें क्या पता था कि एक दिन आगे चलकर यह मुद्दों के भी जीने का आधार बनेगी। PRAVASISAMWAD.COM अमर तिवारी हमारा देश कृषि प्रधान है क्योंकि अस्सी प्रतिशत आबादी कृषि पर निर्भर है। किंतु आजकल कृषि पर निर्भरता का ठीक-ठीक आकलन मुश्किल है। जो किसान जहां है वहीं वाटर प्रूफ ही नहीं बल्कि एयर कंडीशन्ड टेंट में धरने पर बैठा है। ऐसी स्थिति में खेती किसानी का पक्का पक्की आंकड़ा निकालना अभी संभव नहीं। वैसे कृषि चर्चा के बीच एक नई फसल आजकल ज्यादा मुनाफा दे रही है। नाम है आक्सीजनण्ण्!  यह एक रासायनिक तत्व है और इसे रंगहीन गंधहीन तथा स्वादहीन कहा गया है। किंतु अब इसमें पहले वाली बात नहीं रही। अब यह रंग गंध और स्वाद युक्त भी हो गया है। चकाचक लल्लनटॉप लगभग ढाई सौ साल पहले कार्ल शीले नामक वैज्ञानिक ने पोटेशियम नाइट्रेट को गर्म करके इसे तैयार किया था। पुनः जोसेफ प्रीस्टले ने मरक्यूरिक ऑक्साइड गर्म करके इसे तैयार किया। तब इसके आविष्कारकों ने इसे प्राणवायु कहा। शायद इसके पहले लोग बाग इसे इस रूप में नहीं जानते थे। जाहिर हैए सांस भी नहीं लेते होंगे ! भला हो उसका जिसने ऑक्सीजन  की खोज कर डाली। वरना दुनिया में कितनी सांसे इसके अभाव में थम गई होतीं । इसके खोजने वालों ने उस समय इसे मात्र प्राणवायु समझा। अर्थात समस्त प्राणियों के जीवन का आधार। किंतु उन्हें क्या पता था कि एक दिन आगे चलकर यह मुद्दों के भी जीने का आधार बनेगी। इसे लेकर आजकल चारों तरफ एक नया बवंडर मचा हुआ है। जीवन प्रदान करने वाले ऑक्सीजन पर एक नया चार्ज लगाया गया है। उसके कारण कितनी मौतें हुईं और कितनी जाने बचीं! कितने लोग जन्नत और जहन्नुम के बीच अभी पैदल यात्रा कर रहे हैं और इन सब के लिए इसका जिम्मेदार कौन है इस सब्जेक्ट पर कौन किसे टोपी पहना रहा है और कौन किसकी टोपी उतार रहा है।सिलेंडर क्यों नहीं मिल रहा जिसमें ऑक्सीजन नामक प्राणवायु को कैद करके रखा गया है गंगा आए कहां से गंगा जाए कहां रे की तर्ज पर ये सिलेंडर आए कहां से और ये सिलेंडर जाए कहां रे चिंतन का एक नया यक्ष प्रश्न बन चुका है। अच्छा है कि यह कलयुग में उठा प्रश्न है अन्यथा युधिष्ठिर जी महाराज भी अनुत्तरित रह जाते। दुर्भाग्य की पराकाष्ठा है कि पूरा विश्व महामारी से जूझ रहा है। वहीं एक अच्छी खबर यह है कि ताबड़तोड़ वैक्सीन उत्सव में ढोल की मधुर ध्वनि भी चहुंओर उफान पर है। कहीं कमी का ढिंढोरा तो कहीं  लाखों लाख रिकॉर्ड वैक्सीनेशन  की घोषणा! आखिर पदार्थ के तीनों रूप  ठोस द्रव और गैस सबकी खेती इसी मौसम में हो रही है। देखिए कभी-कभी ऐसा लगने लगता है। परन्तु सच में हो न हो इसलिए रेडीमेड सुरक्षात्मक डिस्क्लेमर स्मरण कर लेना चाहिए। क्योंकि ऐसी स्थिति में जिसने भी पॉजिटिव बनने प्रयास किया उसकी तो खैर नहीं। वैसे पॉजिटिव आत्माओं की थन दुहने के लिए ऑक्टोपसों की पूरी टीम का हरकत में आना उनकी प्रकृति है कोई दोष नहीं। सौ पचास का सामान आज कितने में मिलेगा इसकी गारंटी मनुष्य क्या उसके सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी के पास भी नहीं। पूरा खेती किसानी कन्फ्यूजन में है. मेरी प्यारी बिटिया बुद्धिमती की मंदबुद्धि माता भी कन्फ्यूजिआई हुई बुदबुदा रही है सुनिये जी! आश्वासनों की आस से अच्छा है पर्यावरण पर नैसर्गिक और सकारात्मक विश्वास! अस्तु अच्छा रहेगा कि अपना हाथ जगन्नाथ की तर्ज पर अपनी रक्षा के लिए स्वयं प्राकृतिक ऑक्सीजन की फसल उगायें! और हाँ इसे सूँघें भी!!   आवश्यकता पड़ने पर प्राणवायु ऑक्सीजन मिले न मिले किंतु प्रत्येक चैनल पर इसके विज्ञापन अवश्य मिल जाएंगे। विलंब कहां हुआ कौन इसका वास्तविक जिम्मेदार है, किसने इसकी सप्लाई पाइप काटी किसने मॉक ड्रिल किया किसने इसमें अपनी टांग अड़ाई यह बताने के लिए मुस्कुराते हुए रंग.बिरंगे मोफलर. बेमोफलर चेहरे भी दिखेंगे। यही जानने के लिए इन्हें गौर से देखिये  और पूरी गंभीरता से देखते रहिये। विश्वास करिये एक न एक दिन ऐसा अवश्य आएगा जब  ऑक्सीजन का वह प्राणदायी सिलेंडर सबके पीछे खड़ा होगा। उसमें से निकलती हुई रंगीन पाइप प्रत्येक जरूरतमंद के नाक में होगी और वे इसे सूँघते नजर आएंगे। अब प्रचुर मात्रा में इसकी खेती प्रारंभ हो रही है। हर जगह मतलब यहां वहां जहां तहां मत पूछो कहां कहां सूचना है कि तीसरी लहर से सुरक्षा की तैयारी के आदेश निर्गत कर दिए गए हैं। किंतु कब तक फसल कटेगी यह गारंटी नहीं! पूरा खेती किसानी कन्फ्यूजन में है. मेरी प्यारी बिटिया बुद्धिमती की मंदबुद्धि माता भी कन्फ्यूजिआई हुई बुदबुदा रही है। सुनिये जी! आश्वासनों की आस से अच्छा है पर्यावरण पर नैसर्गिक और सकारात्मक विश्वास! अस्तु अच्छा रहेगा कि अपना हाथ जगन्नाथ की तर्ज पर अपनी रक्षा के लिए स्वयं प्राकृतिक ऑक्सीजन की फसल उगायें! और हाँ इसे सूँघें भी!! (लेखक वरिष्ठ व्यंग्य साहित्यकार एवं स्तंभकार हैं) — साभार हॉटलाइन
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