August 31, 2026
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जब अक्षर बन जाएँ कला: महिलाओं, परंपरा और सोशल मीडिया ने दक्षिण भारत में अरबी सुलेख को दी नई पहचान

 

पवित्र आयतों से लेकर आधुनिक कैनवास तक, दक्षिण भारत में अरबी सुलेख को साधने वाली नई पीढ़ी तैयार हो रही है। महिला कलाकारों, सोशल मीडिया और व्यवस्थित प्रशिक्षण कार्यक्रमों ने सदियों पुरानी इस कला को धार्मिक ग्रंथों के पन्नों से निकालकर समकालीन कला की दुनिया तक पहुँचा दिया है।

सदियों से अरबी सुलेख केवल सुंदर लिखावट नहीं रहा है। यह आस्था, अनुशासन, संस्कृति और पहचान की अभिव्यक्ति रहा है। लेकिन दक्षिण भारत में यह कला अब एक नए दौर में प्रवेश कर रही है। कभी मुख्य रूप से धार्मिक ग्रंथों, विशेषकर कुरआन, से जुड़ा माना जाने वाला अरबी सुलेख अब कैनवास, दीवारों, सजावटी वस्तुओं और समकालीन कलाकृतियों में भी अपनी जगह बना रहा है।

इस बदलाव के केंद्र में महिला कलाकारों का एक बढ़ता हुआ समुदाय है। अपनी रचनात्मक व्याख्याओं के माध्यम से ये कलाकार अरबी अक्षरों को पारंपरिक धार्मिक और सांस्कृतिक दायरों से बाहर के दर्शकों तक पहुँचा रही हैं। सोशल मीडिया ने इस प्रयास को और गति दी है। इंस्टाग्राम और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म अब एक तरह की आभासी कला दीर्घा बन गए हैं, जहाँ अरबी लिपि की बारीक रेखाएँ, कलात्मक संरचनाएँ और आधुनिक प्रयोग हजारों लोगों तक पहुँच रहे हैं।

हालाँकि, यह पुनर्जागरण केवल किसी प्राचीन कला को नए रूप में प्रस्तुत करने तक सीमित नहीं है। दक्षिण भारत में यह भी प्रयास हो रहा है कि पारंपरिक सुलेख की मूल तकनीकों और अनुशासन को संरक्षित रखते हुए अगली पीढ़ी तक पहुँचाया जाए।

परंपरा और आधुनिक शिक्षा का संगम

टीएनसी (तमिलनाडु कैलिग्राफी) परियोजना इसी संगम का एक दिलचस्प उदाहरण है। तमिलनाडु अरबी कैलिग्राफी हब जैसे मंचों और तिरुचिरापल्ली के प्रमुख संस्थानों, जिनमें नेशनल कॉलेज तिरुचिरापल्ली (NCT) भी शामिल है, में संचालित व्यवस्थित अकादमिक पाठ्यक्रमों के माध्यम से विद्यार्थियों को इस कला को अनुशासित और पारंपरिक पद्धति से सीखने का अवसर मिल रहा है।

यह पहल पारंपरिक गुरु-शिष्य परंपरा को क्षेत्रीय शैक्षणिक परिवेश के अनुरूप आधुनिक रूप देती है। इसका विशेष फोकस स्कूली विद्यार्थियों, कॉलेज छात्रों और संस्कृति में रुचि रखने वाले लोगों पर है। इस तरह कक्षा और सदियों पुरानी उस्ताद-शागिर्द परंपरा के बीच एक जीवंत सेतु तैयार हो रहा है।

अक्षर से पहले कलम की शिक्षा

सामान्य हैंडराइटिंग कक्षाओं के विपरीत, यहाँ यात्रा पहले अक्षर से नहीं, बल्कि कलम से शुरू होती है।

विद्यार्थियों को सबसे पहले सुलेख में इस्तेमाल होने वाले पारंपरिक उपकरणों से परिचित कराया जाता है। इनमें प्रमुख है कलम (Qalam)—बाँस या सरकंडे से बनी विशेष कलम, जिसकी नोक को एक निश्चित कोण पर काटा जाता है। इस प्रक्रिया को कलम मेकिंग कहा जाता है। नोक को किस कोण पर काटा गया है, यही आगे बनने वाली रेखा की मोटाई और अक्षर के स्वरूप को प्रभावित करता है।

स्याही तैयार करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। पारंपरिक काली, पानी में घुलनशील स्याही के साथ लिका (Lika) का प्रयोग किया जाता है। यह स्याही की डिबिया के भीतर रखा गया रेशम का छोटा-सा गुच्छा होता है, जो कलम द्वारा सोखी जाने वाली स्याही की मात्रा को नियंत्रित करता है।

विद्यार्थी अहर पेपर (Ahar Paper) पर भी अभ्यास करते हैं। यह विशेष रूप से तैयार किया गया चमकदार कागज होता है, जिस पर कलम आसानी से फिसलती है। शुरुआती विद्यार्थियों के लिए इसकी एक और खासियत यह है कि स्याही पूरी तरह सूखने से पहले हुई गलतियों को सुधारा जा सकता है।

इस तरह सुलेख की कक्षा में हर उपकरण स्वयं एक शिक्षक बन जाता है। विद्यार्थी केवल अक्षर बनाना नहीं सीखता, बल्कि यह भी समझता है कि कलम, स्याही, कागज और हाथ की गति किस तरह एक साथ मिलकर सुंदर रचना तैयार करते हैं।

एक बिंदु का अनुशासन

पारंपरिक अरबी सुलेख के केंद्र में है नुक्ता (Nuqtah)—अर्थात बिंदु। यही अक्षरों के आकार और अनुपात को मापने की मूल इकाई है। किसी अक्षर की ऊँचाई, चौड़ाई और संरचना कलम की नोक से बनने वाले बिंदु के आकार के आधार पर निर्धारित की जाती है।

इस सूक्ष्म सटीकता को पारंपरिक शिक्षण पद्धति मेस्क (Mesk) और तकलीद (Taklid) के माध्यम से सिखाया जाता है।

मेस्क का अर्थ है—ध्यानपूर्वक देखना और समझना। शिक्षक विद्यार्थियों के सामने किसी अक्षर या रेखा का नमूना बनाते हैं और उसके हर स्ट्रोक के कोण, दबाव, दिशा और गति को समझाते हैं। विद्यार्थी पहले उसे ध्यान से देखता है और फिर स्वयं बनाने का प्रयास करता है।

इसके बाद आता है तकलीद—अर्थात अनुकरण। विद्यार्थी शिक्षक के बनाए नमूने को बार-बार दोहराते हैं और घर पर भी लंबे समय तक अभ्यास करते हैं। लगातार दोहराव से हाथ में मांसपेशीय स्मृति विकसित होती है और अक्षरों के अनुपात, लय तथा उनके बीच की दूरी की समझ गहरी होती जाती है।

इसके बाद आता है सुधार का चरण। शिक्षक विद्यार्थियों की कृतियों को बारीकी से देखते हैं और कई बार लाल स्याही से सुधार करते हैं, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि किसी वक्र, कोण या झुकाव में निर्धारित अनुपात से कहाँ और कितना अंतर रह गया है।

यह धीमी और धैर्यपूर्ण प्रक्रिया है। लेकिन यही विद्यार्थियों को सिखाती है कि सुलेख में महारत गति से नहीं, बल्कि निरंतर अभ्यास, धैर्य और एकाग्रता से हासिल होती है।

और धैर्य को ही वरिष्ठ सुलेख कलाकार अच्युत पल्लव इस कला की आत्मा मानते हैं।

ब्लैकबोर्ड से अक्षरों की दुनिया तक

66 वर्षीय मुंबई निवासी और मराठी के प्रसिद्ध मास्टर कैलिग्राफर अच्युत पल्लव के लिए अक्षरों की दुनिया में प्रवेश किसी सुनियोजित करियर योजना का परिणाम नहीं था। यह यात्रा एक साधारण स्कूली जिम्मेदारी से शुरू हुई।

कक्षा 8 में उनके शिक्षक ने उन्हें ब्लैकबोर्ड पर “आज का सुविचार” लिखने का काम दिया। उस समय शायद उन्हें अंदाजा भी नहीं था कि ब्लैकबोर्ड पर लिखे जा रहे वे अक्षर उन्हें जीवनभर टाइपोग्राफी और सुलेख की दुनिया से जोड़ देंगे।

2025 में पद्मश्री से सम्मानित पल्लव ने दशकों तक भारतीय लिपियों की कलात्मक संभावनाओं का अध्ययन और प्रयोग किया है। उन्हें मुक्तलिपि (Muktalipi) के सृजन का श्रेय दिया जाता है, जो मोदी और देवनागरी लिपियों

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