बेंगलुरु की बदलती पहचान के बीच कुछ रंग ऐसे हैं, जो समय की सीमाओं को पार कर हमेशा जीवित रहते हैं। ऐसे ही रंगों के साधक थे चित्रकार रुमाले चन्नाबसवैया, जिनकी कला आज भी पुराने बेंगलुरु की आत्मा को सजीव कर देती है। नेशनल गैलरी ऑफ़ मॉडर्न आर्ट ने मंगलवार को इस महान कलाकार को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके योगदान को याद किया—एक ऐसा योगदान, जो केवल कैनवास तक सीमित नहीं, बल्कि शहर की स्मृतियों में गहराई से दर्ज है।

10 सितंबर को उनकी 111वीं जयंती के अवसर पर, कला जगत ने एक बार फिर उनके उन चित्रों को याद किया, जो बेंगलुरु के फूलों से लदे पेड़ों, शांत गलियों और प्राकृतिक सौंदर्य से प्रेरित थे। उनकी प्रसिद्ध कृतियाँ—‘प्ले ऑफ़ लाइट-हाई कोर्ट’, ‘के आर सर्कल इन ब्लूम’ और ‘करीघाटा हिलॉक’—सिर्फ चित्र नहीं, बल्कि एक युग की झलक हैं। जल रंगों पर उनकी पकड़ इतनी अद्वितीय थी कि उसने राष्ट्रीय ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय कलाकारों का भी ध्यान आकर्षित किया।
एक ऑनलाइन कार्यक्रम में कलाकार रविकुमार काशी ने उनसे अपनी पहली मुलाकात को याद करते हुए एक भावुक प्रसंग साझा किया। “लालबाग की एक यात्रा के दौरान मैंने एक बुजुर्ग व्यक्ति को देखा, जो अपने सामने फैले तेल रंगों के साथ एक सुंदर परिदृश्य बना रहे थे। जब मैं उनके पास गया, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए खुद को रुमाले बताया। मेरी रुचि देखकर उन्होंने मुझे राजाजीनगर स्थित अपने घर आमंत्रित किया, जहाँ उनकी अनेक कृतियाँ प्रदर्शित थीं,” काशी ने कहा। वे बताते हैं कि बचपन में भले ही वे उस कला की गहराई को पूरी तरह न समझ पाए हों, लेकिन आज वह अनुभव उनके लिए अनमोल है।

रुमाले का व्यक्तित्व उतना ही रंगीन था, जितनी उनकी कला। कलाकार कमलाक्षी याद करती हैं, “वे हमेशा कला पर चर्चा करने के लिए उत्सुक रहते थे। 60 के दशक में जब मैं पहली बार उनकी प्रदर्शनी में उनसे मिली, तो उन्होंने जल रंगों की शुद्धता और अपनी तकनीकों के बारे में इतनी लगन से बताया कि वह अनुभव आज भी स्मरणीय है।”
लेकिन रुमाले केवल एक कलाकार ही नहीं थे। वे स्वतंत्रता सेनानी और गांधीवादी विचारधारा के अनुयायी भी थे। सेवा दल में सक्रिय रहते हुए उन्होंने कुछ समय के लिए कला से दूरी बना ली थी, लेकिन 1960 में उन्होंने फिर से अपनी तूलिका उठाई। बाद में वे राजनीति में भी सक्रिय हुए और एमएलसी बने। इस दौरान भी उन्होंने कलाकार समुदाय का निरंतर समर्थन किया।
कला और समाज—दोनों क्षेत्रों में उनके योगदान को याद करते हुए कलाकार और क्यूरेटर सुरेश जयराम कहते हैं, “रुमाले आधुनिक कला और राज्य, दोनों के लिए महत्वपूर्ण योगदानकर्ता थे।” कर्नाटक सरकार ने उन्हें कई प्रमुख स्थानों को चित्रित करने का दायित्व सौंपा था, जो उनके प्रति सम्मान और विश्वास का प्रतीक है।

आज भी उनकी कृतियाँ विभिन्न सरकारी कार्यालयों में सजी हैं और राजाजीनगर स्थित ‘रुमाले आर्ट हाउस’ में प्रदर्शित की जाती हैं, जो फिलहाल महामारी के कारण अस्थायी रूप से बंद है।
10 सितंबर, 1910 को डोड्डबल्लापुर में जन्मे रुमाले ने बेंगलुरु के कलामंदिरा और मैसूर के चामराजेंद्र तकनीकी संस्थान में कला की शिक्षा प्राप्त की। बेंगलुरु के लैंडस्केप को अपनी कला में अमर करने वाले इस कलाकार ने न केवल शहर की खूबसूरती को कैनवास पर उतारा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सांस्कृतिक विरासत भी छोड़ी।
रुमाले चन्नाबसवैया की कला हमें यह याद दिलाती है कि शहर केवल इमारतों से नहीं बनते—वे उन कहानियों, रंगों और स्मृतियों से बनते हैं, जिन्हें कलाकार अपनी तूलिका से सहेज लेते हैं


