September 5, 2026
17 mins read

कैनवास पर कृष्ण, दिल में द्वारका: मुस्लिम कलाकार की अद्भुत कला-यात्रा

 

जब कोई चित्रकार किसी कहानी से दिल से जुड़ जाता है, तो उसकी तूलिका क्या रचती है? गुजरात के जामनगर में इसका जवाब बेहद खूबसूरत है — कैनवास पर कृष्ण जीवंत हो उठते हैं।

मिलिए कुंभिया फखरुद्दीनभाई अली से, जिन्हें लोग के. एफ. अली या फखरुद्दीनभाई के नाम से भी जानते हैं। करीब चार दशकों से वे अपनी कल्पना, यादों और भावनाओं को रंगों के जरिए कैनवास पर उतार रहे हैं। और उनकी कला का एक खास विषय है — भगवान कृष्ण।

कभी बांसुरी बजाते कृष्ण, कभी आनंद और शरारत से भरी मटकी फोड़ लीला और कभी द्वारका के शानदार दृश्य — फखरुद्दीनभाई की जीवंत ऑयल पेंटिंग्स रंग, भाव और भक्ति से भरपूर हैं। लेकिन इन चित्रों के पीछे की कहानी भी उतनी ही खूबसूरत है। एक मुस्लिम कलाकार द्वारा कृष्ण को चित्रित करना फखरुद्दीनभाई के लिए केवल एक अलग तरह का कलात्मक चुनाव नहीं है, बल्कि यह द्वारका में बिताए उनके वर्षों और वहां विकसित हुए गहरे भावनात्मक जुड़ाव की अभिव्यक्ति है।

आज उनकी पेंटिंग्स खासकर जन्माष्टमी के आसपास लोगों का ध्यान खींच रही हैं। दर्शक न केवल उनके चित्रों की बारीकियों और खूबसूरती की सराहना कर रहे हैं, बल्कि उनमें दिखाई देने वाले सांस्कृतिक मेल-जोल और सद्भाव के संदेश को भी महसूस कर रहे हैं।

फखरुद्दीनभाई के लिए कैनवास शायद वह जगह बन गया है, जहां सीमाएं मिट जाती हैं, कहानियां एक-दूसरे से जुड़ती हैं और भक्ति अपनी अलग भाषा — रंगों — में व्यक्त होती है।

रंगों के साथ बीती एक पूरी जिंदगी

फखरुद्दीनभाई लगभग 40 वर्षों से चित्रकारी कर रहे हैं। धैर्य, बारीकी से देखने की कला और कैनवास के प्रति गहरे प्रेम ने उनकी इस कलात्मक यात्रा को आकार दिया है।

इन वर्षों में चित्रकारी उनके लिए सिर्फ एक पेशा नहीं रही। इसने उन्हें उन जगहों, परंपराओं और भावनाओं को कैनवास पर उतारने का माध्यम दिया, जो उनकी जिंदगी में हमेशा खास रही हैं।

उनकी कला पर सबसे गहरा प्रभाव डालने वाली जगहों में द्वारका प्रमुख है। फखरुद्दीनभाई ने अपने जीवन के महत्वपूर्ण वर्ष इस पवित्र नगरी में बिताए। इसी दौरान भगवान द्वारकाधीश और शहर की सांस्कृतिक विरासत से उनका गहरा भावनात्मक रिश्ता बना।

आज उनकी पेंटिंग्स में उन्हीं यादों की झलक दिखाई देती है।

जब कैनवास से बाहर आते हैं कृष्ण

फखरुद्दीनभाई की कृष्ण पेंटिंग्स को गौर से देखें तो उनमें बहुत कुछ देखने को मिलता है।

कहीं बांसुरी लिए कृष्ण हैं, तो कहीं उनके बाल रूप से जुड़ी परिचित छवियां। कहीं मटकी फोड़ लीला की चंचलता और उत्सव का माहौल है, तो कहीं कृष्ण के साथ द्वारका के खूबसूरत दृश्य और प्रतिष्ठित सुदर्शन सेतु नजर आता है।

उनकी ऑयल पेंटिंग्स रंगों और बारीकियों से भरपूर हैं। लेकिन उनकी खूबसूरती सिर्फ तकनीक तक सीमित नहीं है। हर चित्र में एक आत्मीयता और श्रद्धा महसूस होती है।

कलात्मक कुशलता और भावनात्मक जुड़ाव का यही मेल उनकी पेंटिंग्स को खास बनाता है और जन्माष्टमी के दौरान उनकी कला को विशेष लोकप्रियता दिलाता है।

धर्म की सीमाओं से परे कला की एक कहानी

फखरुद्दीनभाई की यात्रा का सबसे दिलचस्प पहलू शायद यह नहीं है कि वे क्या चित्रित करते हैं, बल्कि यह है कि उनकी कला एक बड़ी कहानी कैसे कहती है।

वे एक मुस्लिम कलाकार हैं, जिन्होंने अपनी कलात्मक प्रतिभा के माध्यम से हिंदू धर्म के सबसे प्रिय देवताओं में से एक, भगवान कृष्ण, को चित्रित करने का रास्ता चुना। उनकी कला हमें सहज रूप से याद दिलाती है कि कला हमेशा उन सीमाओं को नहीं मानती, जो इंसान अपने आसपास खींचता है।

किसी कहानी से हर कोई जुड़ सकता है।

कोई स्थान हर किसी को प्रेरित कर सकता है।

और खूबसूरती को हर कोई महसूस कर सकता है।

फखरुद्दीनभाई के मामले में कृष्ण से उनका जुड़ाव द्वारका में बिताए वर्षों के दौरान और गहरा हुआ और फिर उनकी तूलिका के जरिए कैनवास पर उतर आया।

गुजरात की संस्कृति, कैनवास पर

गुजरात की सांस्कृतिक परंपरा बेहद रंगीन और विविध रही है, जहां कला, त्योहार, वास्तुकला और कहानी कहने की परंपराएं एक-दूसरे से जुड़ती रही हैं। फखरुद्दीनभाई की पेंटिंग्स भी इसी व्यापक सांस्कृतिक संसार का हिस्सा दिखाई देती हैं।

उनके कृष्ण चित्रों में पारंपरिक धार्मिक प्रतीकों के साथ उनकी अपनी कलात्मक दृष्टि भी दिखाई देती है। यही कारण है कि उनकी कला एक साथ परिचित भी लगती है और व्यक्तिगत भी।

बांसुरी, मटकी, कृष्ण का स्वरूप या द्वारका का दृश्य — उनके हाथों में ये सिर्फ तस्वीरें नहीं रह जाते। वे स्मृति, स्थान और भावनाओं से जुड़ी एक पूरी दृश्य-कहानी बन जाते हैं।

कलाकार की दुनिया से सोशल मीडिया तक

हाल के वर्षों में फखरुद्दीनभाई की कला को खासकर जन्माष्टमी के अवसर पर बढ़ती लोकप्रियता मिली है। उनकी पेंटिंग्स की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर साझा किए जा रहे हैं, जिससे जामनगर से कहीं दूर बैठे लोग भी उनकी कला से परिचित हो रहे हैं।

लोग उनके रंगों से भरे कैनवास, बारीक चित्रकारी और सबसे बढ़कर कलाकार की कहानी से प्रभावित हो रहे हैं।

ऐसे समय में जब पहचान और समुदाय को लेकर चर्चाएं कभी-कभी विभाजन पैदा कर देती हैं, फखरुद्दीनभाई की पेंटिंग्स एक बेहद सकारात्मक तस्वीर सामने रखती हैं।

वे बस कला का उत्सव मनाती हैं।

वे भक्ति का उत्सव मनाती हैं।

और वे इस खूबसूरत संभावना का उत्सव मनाती हैं कि प्रेरणा और सुंदरता किसी एक समुदाय की सीमाओं में बंधी नहीं होती।

जब कला बन जाती है एक सेतु

फखरुद्दीनभाई की कहानी आखिरकार किसी पहचान के लेबल की कहानी नहीं है। यह उस कलाकार की कहानी है, जो जहां से प्रेरणा मिले, वहां अपनी तूलिका को ले जाने की आजादी रखता है।

करीब 40 वर्षों से उनकी तूलिका कहानियों को कैनवास पर उतार रही है। द्वारका में बिताए वर्षों ने उन कहानियों को कृष्ण से एक खास जुड़ाव दिया और आज उनकी पेंटिंग्स देश के सबसे प्रिय त्योहारों में से एक, जन्माष्टमी के दौरान लोगों के चेहरों पर मुस्कान और दिलों में प्रशंसा ला रही हैं।

उनकी कला हमें याद दिलाती है कि कोई पेंटिंग हमें छूने से पहले यह नहीं पूछती कि उसे किसने बनाया है।

वह बस अपनी बात कहती है।

और शायद यही फखरुद्दीनभाई की यात्रा की सबसे खूबसूरत बात है। उनके हाथों में कैनवास सिर्फ रंगों से भरी सतह नहीं रह जाता। वह एक ऐसा मिलन-बिंदु बन जाता है, जहां आस्था, संस्कृति, स्मृतियां और रचनात्मकता एक साथ आ जाती हैं।

तूलिका चलती है।

रंग उभरते हैं।

कृष्ण का स्वरूप आकार लेता है।

और एक पल के लिए, सारी सीमाएं मिट जाती हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Previous Story

मैमूना नरगिस: भारत की धुंधली पड़ती विरासत को नया जीवन देने वाली महिला

Latest from Blog

जब अक्षर बन जाएँ कला: महिलाओं, परंपरा और सोशल मीडिया ने दक्षिण भारत में अरबी सुलेख को दी नई पहचान

पवित्र आयतों से लेकर आधुनिक कैनवास तक, दक्षिण भारत में अरबी सुलेख को साधने वाली नई पीढ़ी तैयार हो

Pravasi Daily News 27.08.2025

Money Expo India to Draw NRI Investors as Mumbai Event Opens This Week https://pravasisamwad.com/money-expo-india-to-draw-nri-investors-as-mumbai-event-opens-this-week/ US Police Arrest Suspect in Murder
Go toTop