आंध्र के तटों से दुनिया की अलमारियों तक: कलमकारी की जीवंत और प्रेरणादायक विरासत | Pravasi Samwad
April 30, 2026
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आंध्र के तटों से दुनिया की अलमारियों तक: कलमकारी की जीवंत और प्रेरणादायक विरासत

 

आंध्र प्रदेश के तटीय मार्ग पर विजयवाड़ा से मछलीपट्टनम की ओर बढ़ते हुए सफर धीरे-धीरे एक खूबसूरत दृश्य में बदल जाता है। हवा में समुद्र की ताजगी घुली होती है और चारों ओर रंग-बिरंगे कपड़े धूप में ऐसे लहराते दिखते हैं मानो धरती पर रंगों की कोई चित्रशाला सजी हो।

यही है पेडाना—एक शांत कस्बा, जो आज भी भारत की समृद्ध ब्लॉकप्रिंटेड कलमकारी कला को जीवित रखे हुए है।

इस कस्बे में दुर्गा नागेश्वर राव जैसे समर्पित शिल्पकार इस परंपरा को नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ा रहे हैं। उनकी कार्यशाला न सिर्फ एक उत्पादन केंद्र है, बल्कि कला, परंपरा और धैर्य का जीवंत संगम है। वर्षों पुरानी यह इकाई आज भी निरंतर काम कर रही है और नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा बन रही है।

कलमकारी, जिसका अर्थ है “कलम से किया गया काम”, प्रकृति और मानव कौशल का अद्भुत मेल है। यहाँ इस्तेमाल होने वाले सभी रंग पूरी तरह प्राकृतिक होते हैं—पौधों की जड़ों, पत्तियों, फलों और खनिजों से तैयार किए गए। यही कारण है कि यह कला न केवल पर्यावरण के अनुकूल है, बल्कि इसकी सुंदरता भी लंबे समय तक बनी रहती है।

पेडाना की कलमकारी की खासियत है इसके लकड़ी के बारीक नक्काशीदार ब्लॉक्स, जिनसे कपड़ों पर खूबसूरत डिज़ाइन उकेरे जाते हैं। हर कपड़ा लगभग 21 दिनों में तैयार होता है और 15 सावधानीपूर्वक चरणों से गुजरता है हर चरण में कारीगरों की मेहनत और लगन झलकती है।

यहाँ के पारंपरिक डिज़ाइन प्रकृति से प्रेरित होते हैं फूल, पत्तियाँ, जीव-जंतु और ‘ट्री ऑफ लाइफ’ जैसे प्रतीक। लेकिन समय के साथ इस कला ने आधुनिक रूप भी अपना लिया है। आज के डिज़ाइनों में समुद्री जीवन, कोरल और लहरों की झलक भी देखने को मिलती है, जो इसे वैश्विक बाजार में और अधिक आकर्षक बनाती है।

राव की कार्यशाला में एक सुंदर तालमेल दिखाई देता है—कोई ब्लॉक प्रिंट कर रहा है, कोई रंग भर रहा है, तो कोई कपड़ों को धूप में सुखा रहा है। यह सिर्फ काम नहीं, बल्कि एक सामूहिक कला-यात्रा है जिसमें हर कारीगर अपनी भूमिका निभाता है।

सबसे खास बात यह है कि यह कला केवल कपड़े नहीं बनाती, बल्कि लोगों को रोज़गार और पहचान भी देती है। राव की इकाई में कई कारीगर—पुरुष और महिलाएँ—समान रूप से काम करते हैं, जो इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।

आज, जब दुनिया तेजी से बदल रही है, पेडाना के ये शिल्पकार हमें यह सिखाते हैं कि परंपरा और आधुनिकता साथ-साथ चल सकते हैं। उनकी मेहनत और जुनून यह साबित करते हैं कि कलमकारी सिर्फ एक कला नहीं, बल्कि एक जीवित विरासत है—जो आंध्र के तटों से निकलकर दुनिया भर की अलमारियों तक अपनी पहचान बना रही है।

यह कहानी उम्मीद की है, समर्पण की है, और उस अटूट विश्वास की है कि जब तक ऐसे कारीगर मौजूद हैं, तब तक कलमकारी की यह खूबसूरत विरासत हमेशा जीवित रहेगी।

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