यशोदा और कृष्ण ने तोड़ा हर रिकॉर्ड: ₹167 करोड़ में बिकी | Pravasi Samwad
April 30, 2026
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यशोदा और कृष्ण ने तोड़ा हर रिकॉर्ड: ₹167 करोड़ में बिकी

 

उन्नीसवीं सदी की कालजयी कृति ‘यशोदा और कृष्ण’, जिसे महान चित्रकार राजा रवि वर्मा ने रचा था, ने कला-जगत में इतिहास रच दिया है। सैफ्रनआर्ट की स्प्रिंग लाइव नीलामी में यह चित्र ₹167.20 करोड़ में बिका किसी भी भारतीय कलाकृति के लिए अब तक की सबसे ऊँची कीमत।

भारतीय आधुनिक कला के जनक माने जाने वाले राजा रवि वर्मा अपनी जीवंत और यथार्थवादी शैली के लिए प्रसिद्ध थे। उन्होंने देवताओं और देवी-देवियों को ऐसे चित्रित किया कि वे केवल पूजनीय ही नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं से भी जुड़े हुए प्रतीत होते हैं। प्रारंभ में उन्होंने राजघरानों के लिए चित्र बनाए, परंतु बाद में अपने मुद्रणों और ओलियोग्राफ्स (रंगीन छाप चित्रों) के माध्यम से कला को आम जन तक पहुँचाकर उन्होंने एक सांस्कृतिक क्रांति का सूत्रपात किया।

सन् 1848 में वर्तमान केरल में जन्मे वर्मा ने भारतीय परंपराओं को यूरोपीय अकादमिक तकनीकों के साथ इस तरह जोड़ा कि भारतीय चित्रकला को एक नई दिशा मिली। उनका प्रभाव आज भी भारतीय उपमहाद्वीप की कलात्मक पहचान को आकार दे रहा है।

इस ऐतिहासिक कृति को उद्योगपति साइरस पूनावाला ने खरीदा, जो सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के संस्थापक हैं। नीलामी से पहले इसकी कीमत 80 से 120 करोड़ रुपये के बीच आँकी गई थी, लेकिन कला प्रेमियों के उत्साह ने इसे अनुमान से कहीं आगे, लगभग दोगुनी कीमत तक पहुँचा दिया। इस सौदे के साथ ही ‘यशोदा और कृष्ण’ ने एम. एफ. हुसैन की चर्चित पेंटिंग ‘ग्राम यात्रा’ का रिकॉर्ड भी तोड़ दिया, जो पिछले वर्ष 118 करोड़ रुपये में बिकी थी।

उन्होंने इस चित्र को “राष्ट्रीय धरोहर” बताते हुए यह इच्छा व्यक्त की कि इसे समय-समय पर आम जनता के दर्शन के लिए उपलब्ध कराया जाएगा।

भारत के प्राचीन स्मारक एवं कला धरोहर अधिनियम के अंतर्गत वर्मा की कृतियों को “कला धरोहर” का दर्जा प्राप्त है, जिसका अर्थ है कि इन्हें देश से बाहर नहीं ले जाया जा सकता और केवल भारतीय खरीदार ही इन्हें प्राप्त कर सकते हैं। यह नीलामी इस बात का प्रमाण है कि भारतीय और दक्षिण एशियाई कला के प्रति रुचि लगातार बढ़ रही है और संग्रहकर्ता इसके लिए अभूतपूर्व मूल्य देने को तैयार हैं।

मीनल वाज़िरानी के अनुसार, यह बिक्री भारतीय कला की गहरी सांस्कृतिक और भावनात्मक गूँज को दर्शाती है। वहीं आशीष आनंद ने कहा कि इस तरह की उपलब्धियाँ भारतीय कला को केवल सौंदर्य की वस्तु नहीं, बल्कि एक गंभीर आर्थिक निवेश के रूप में स्थापित कर रही हैं।

1890 के दशक में, अपने रचनात्मक उत्कर्ष के समय बनाए गए इस चित्र में बालक कृष्ण और उनकी पालक माता यशोदा के बीच का स्नेहपूर्ण क्षण अत्यंत कोमलता से उकेरा गया है। यशोदा गाय का दूध निकाल रही हैं और पास खड़े कृष्ण अपने हाथ में कटोरा लिए प्रतीक्षा कर रहे हैं। उनके चेहरे की चंचलता और यशोदा के स्नेहिल भाव मिलकर एक ऐसा दृश्य रचते हैं, जो साधारण होते हुए भी अत्यंत भावपूर्ण और जीवंत है।

वर्मा की सबसे बड़ी विशेषता यही थी कि उन्होंने दिव्यता को मानवीय संवेदनाओं से जोड़ दिया। उन्होंने पौराणिक पात्रों को इस तरह प्रस्तुत किया कि वे हमारे अपने जीवन का हिस्सा प्रतीत होने लगे। राजा रवि वर्मा हेरिटेज फाउंडेशन के शब्दों में, उनकी कला पवित्रता को आत्मीयता में बदल देती है।

कला इतिहासकारों का मानना है कि वर्मा ने देवताओं की पारंपरिक छवि को एक नई परिभाषा दी। जैसा कि कलाकार ए. रामचंद्रन ने कहा, जहाँ पहले देवताओं की छवियाँ केवल श्रद्धा और विस्मय उत्पन्न करती थीं, वहीं वर्मा ने उनमें प्रेम और अपनापन भर दिया—दर्शक को ईश्वर के और निकट ले आते हुए।

यह रिकॉर्ड तोड़ नीलामी कला बाज़ार में हो रहे व्यापक परिवर्तन की ओर भी संकेत करती है। वर्मा, अमृता शेर-गिल और वी. एस. गायतोंडे जैसे कलाकारों की कृतियाँ अक्सर निजी संग्रहों में सुरक्षित रहती हैं और बहुत कम नीलामी में आती हैं, जिससे उनकी दुर्लभता और मूल्य दोनों बढ़ जाते हैं। अब संग्रहकर्ता भारतीय कला को उसकी सांस्कृतिक गहराई के साथ-साथ एक महत्वपूर्ण निवेश के रूप में भी देखने लगे हैं।

किलिमनूर की साधारण गलियों में प्राकृतिक रंगों से चित्र बनाते एक बालक से लेकर विश्व-प्रसिद्ध कलाकार बनने तक, वर्मा की यात्रा स्वयं भारतीय कला के उत्कर्ष की कहानी है जो परंपरा में रची-बसी है, फिर भी अपनी सीमाओं को लाँघकर वैश्विक ऊँचाइयों तक पहुँचती है।

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