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विविध - Page 10

बनारस की बसंत पंचमी

बनारस एक ऐसा शहर है जहाँ इतिहास अपने सम्पूर्ण वैभव के साथ वर्तमान से मिलता है और वर्तमान भी उदार

हरिवंश राय ‘बच्चन’ जयंती विशेष

मधुशाला मेरी समझ में अपने आप में सम्पूर्ण, एक व्यापक जीवन दर्शन है  और कई बार हाला अपने शाब्दिक अर्थ की परिसीमा को  लाँघकर लाक्षणिक अर्थ ग्रहण कर लेती है।  कई बार वह विशुद्ध हाला ही रहती है, लोग चाहे उसकी

देव दीपावली की वो शाम …

..उन बंगाली मित्र के प्रति मेरे मन में प्रेम और श्रद्धा ऐसा नहीं है कि अब आई हो। देव दीपावली की शाम से पूर्व ही उन्होंने हमसे कहा कि उनकी सखी और उसकी कुछ सहेलियां भी देव दीपावली देखने की आकांक्षी हैं और भीड़ के भय से वे हमारे साथ आना चाहती हैं।बस वो दिन है और आज का दिन है, उसके प्रति मेरे मन में  प्रेम बना हुआ है। PRAVASISAMWAD.COM जब कभी भी मैं गुलाम अली साहब का गाना “चुपके-चुपके रात दिन… ” सुनता हूँ तो मुझे अपने

बनारस इश्क है

यह शहर भौगोलिक इकाई मात्र नहीं है बल्कि एक मिज़ाज है, एक मौज है,  एक अल्हड़ मस्ती है, एक बेफिक्री है और सबसे उपर एक रस है PRAVASISAMWAD.COM समुद्र मंथन से निकले विष को सहर्ष पी लेना और उसके बाद अमरत्व पा जाना, यह बस

दास्तान-ए-इश्क़ भाग #8

मैं इश्क़ के मैदान में हार गया और इस हार के साथ ही विवाह कर के इस मैदान से हट गया, तो बस दास्तान-ए-इश्क़ यहीं ख़त्म हुआ और इसके साथ ख़त्म हुआ ज़िन्दगी का एक खुशनुमा पहलू  PRAVASISAMWAD.COM कूचा-ए-जाना से निकाले लोग अक्सर मयकदे में जाते हैं l मैं मयकदे बहुत पहले आ गया था और

दास्तान-ए-इश्क़ भाग #7

इश्क़ में हर पटाक्षेप के बाद भी हल्की सी टीस रह ही जाती है, विशेषकर तब जब आपका महबूब गुज़रते वक़्त के साथ सुंदर होता जाए।समझा जाए तो वो ताजमहल होती गई और मैं अपने तमाम ज्ञान के साथ नालंदा विश्वविद्यालय का खंडहर PRAVASISAMWAD.COM गया एक महान तीर्थ है, मोक्षधाम है।  मोक्ष हिन्दू धर्म की मान्यताओं में आत्मा की सर्वोत्तम परिणति है। जीवित व्यक्ति के लिए गया अभी भी तीर्थ गयाजी कम और गयासुर राक्षस अधिक है। फिर भी जिस-तिस प्रकार गया प्रवास पूरा हुआ। One who is down, fears no fall के पाश्चात्य ज्ञान के आधार पर मैंने भाग्य को चुनौती दी थी कि अब गया से गई बीती जगह पर मेरा तबादला क्या होगा? भाग्य ने चुनौती स्वीकार की और मेरे पदस्थापन रक्सौल हुआ। रक्सौल भारत-नेपाल सीमा पर अवस्थित एक स्थान है जिसे आप अपनी स्वेच्छा और सुविधा के हिसाब से गाँव, शहर, कस्बा अथवा नरक कह सकते हैं। धूमिल ने कहीं लिखा है : ‘जहन्नुम कचहरी से चल रहा है’, नर्क से न सही न्यायालय से परिचित हूँ और चित हूँ। इसी तर्ज पर मैं भी कह सकता हूँ कि नर्क से न सही रक्सौल से परिचित हूँ और चित हूँ। जाम, ट्रैफिक, गंदगी, भ्रष्टाचार आदि तमाम यातनाएँ इस स्थान का परिचय हैं। हल्की फुहार के बाद ही आपको पता न चलता कि सड़क पर कीचड़ है अथवा आप किसी विशाल नाले में हैं। वैसे रक्सौल नाम की व्युत्पत्ति का एक रोचक मौखिक इतिहास सुना। “अंग्रेज अधिकारी लगान वसूल करने जब रक्सौल जाते तो यहाँ के निवासी भागकर नेपाल चले जाते, फिर जब वे लौट जाते तो वे पूर्ववत रक्सौल चले आते। ऐसा जब एकाधिक बार हो गया, तो अंग्रेज़ अधिकारी ने खीझ और झुंझलाहट में कहा रास्कल्स। रक्सौल उसी रास्कल्स का भोजपुरी अपभ्रंश है।” मैं इसकी पुष्टि नहीं करता, पर अब तो समाचार-पत्र से लेकर अन्य माध्यम तक अपुष्ट जानकारी देते ही रहते हैं, ऐसे में TRP के लिहाज से महत्त्वपूर्ण और रोचक तथ्य अपुष्ट होने पर भी साझा किए ही जा सकते हैं। यह हमारे यहाँ चलन में है, जल्द ही झूठ हमारी परंपरा का हिस्सा होगी। रक्सौल में मेरा इश्क़ दूरसंचार से चल रहा था। फ़िराक था सो खूब शराब पी जा रही थी और खूब शायरी पढ़ी जा रही थी। मैंने इज़हार-ए-मोहब्बत कई बार किया पर उसने हर बार टाल दिया। न इक़रार, न इनकार। मेरी हालत उस परीक्षार्थी की तरह थी जिसकी परीक्षा खराब गई थी मगर मात्र भाग्य और भगवान के भरोसे उत्तीर्ण होने की हल्की उम्मीद भी थी। यह स्थिति बड़ी कठिन होती है। हम रोज़ बात करते, पर इस सवाल पर वो कन्नी काट जाया करती। मुझे समझ लेना चाहिए था, जो कि मैंने कुछ विलम्ब से किया, कि वह “न ब्रूयात अप्रियं सत्यं” के मधुर सनातन सिद्धान्त पर चल रही थी। अहमद फ़राज़ के इस शेर इससे पहले कि बेवफा हो जाएँ, क्यों न ए दोस्त हम जुदा हो जाएँ तू भी हीरे से बन गया पत्थर, हम भी कल जाने क्या से क्या हो जाएँ से हमने इस कहानी का भी पटाक्षेप किया। इश्क़ में हर पटाक्षेप के बाद भी हल्की सी टीस रह ही जाती है, विशेषकर तब जब आपका महबूब गुज़रते वक़्त के साथ सुंदर होता जाए। समझा जाए तो वो ताजमहल होती गई और मैं अपने तमाम ज्ञान के साथ नालंदा विश्वविद्यालय का खंडहर। क्रमशः…

दास्तान-ए-इश्क़ भाग #6

इश्क़ के अंकुर निकले और वे भी वहाँ जहाँ इसकी संभावना सबसे कम थी। यह मेरे जीवन का सबसे सेक्युलर काल था PRAVASISAMWAD.COM मेरा पहला पदस्थापन गया हुआ था, जो गया हुआ पदस्थापन ही था। गया के विषय में प्रचलित है कि वहाँ की नदी में पानी नहीं, पहाड़ों पर पेड़ नहीं और आदमी में माथा नहीं। पहले दो तो स्पष्ट ही दिख जाते हैं, तीसरे के लिए कुछ वक़्त गया में बिताना पड़ता है। ABC बैंक की AC बिगड़ी हुई थी, संस्कृति सुधार की सीमाओं को लाँघकर बिगड़ी हुई थीं और ऐसे में यह ख्याल कि फ़ैज़ ने यह शेर ABC बैंक वालों को ही ध्यान में रखकर लिखा होगा सहसा मन मे आ ही जाता है। दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दिया तुझ से भी दिल–फ़रेब हैं ग़म रोज़गार के कहने को दो शिफ़्ट लगती थी पर हम सुबह 8 से शाम 8 तक कैश काउंटर चलाते थे। फुर्सत साँस लेने की भी नहीं थी, लेकिन जीवन का प्रस्फुरण आदर्श परिस्थितियों का मोहताज नहीं होता। इश्क़ के अंकुर निकले और वे भी वहाँ जहाँ इसकी संभावना सबसे कम थी। यह मेरे जीवन का सबसे सेक्युलर काल था और इस काल में मैं हिन्दू-मुसलमान में परस्पर वैवाहिक संबंधों का जबरदस्त पक्षधर रहा। कुछ दिनों बाद मैंने अपना ध्यान धार्मिक एकता से हटाकर जातीय एकता पर लगाया। इश्क़ ने स्वयंसेवकों की शाखा से मुझे ऐसा तोड़ा कि मैं न मनुवादी ही रहा, न संघी। ख़ैर, यहाँ मयकशी में मैंने नित नए परचम लहराए। सुबह 6 बजे तक पीते रहने के बाद पौने 8 बजे शाखा में उपस्थित होने से लेकर, शाम 8 बजे से रात 11 बजे तक शाखा में पीने तक, सब कुछ किया गया। इस काल में मुझे ज्ञात हुआ कि भारतीय स्त्रियों को शराब से कुछ विशेष बैर है। यह ज्ञान आते-आते जीवन में 28 पतझड़ बीत चुके थे। इस तरफ़ बहार शायद आई ही नहीं या आई भी तो बिना मुझसे मिले चली गई। अकबर इलाहाबादी का यह शेर पढ़ते हुए वक़्त कट रहा था वो गुल हूँ ख़िज़ाँ ने जिसे बर्बाद किया है उलझूँ किसी दामन से मैं वो ख़ार नहीं हूँ और तब तक शाखा प्रबंधक के पद पर प्रोन्नति के साथ पदस्थापना का पत्र मिला। अब लगने लगा कि बस-अंत ही नहीं होता, बसन्त भी होता है। क्रमशः… ************************************************************************ Readers These

योग के आयाम: आधुनिक परिप्रेक्ष्य में योग का स्वरूप

योग सम्पूर्ण व्यक्तित्व के रुपांतरण की प्रक्रिया है जो कहने , सुनने अथवा देखने की नहीं अपितु अनुभूति की अभिव्यक्ति है । यह मात्र आसन , प्राणायाम नहीं बल्कि जीवन जीने की कला है । इसकी अभिव्यक्ति हमारे व्यवहार में तब होने लगती है जब यह हमारी दिनचर्या में हर पल रच बस जाती है । इस अभिव्यक्ति का मुख्य आधार  “यम” एवं “नियम” है जो यौगिक जीवन की पहली सीढ़ी है, जिस पर पहला कदम संकल्प के सहारे बढ़ाया जा सकता है । संकल्प का बीजारोपण श्रद्धा और विश्वास से होता है , अपने कर्म के प्रति , अपने ईष्ट के प्रति तथा अपने गुरु के प्रति । जिस प्रकार एक किसान जमीन के टुकड़े की जुताई करता है , उसमें से कंकड़ , पत्थर और मोथों को निकाल कर नरम बनाता है , फिर खाद , पानी डालकर बीज बोने के लिए खेत तैयार करता है उसी प्रकार ” यम और नियम ” भी हमारे व्यवहार में आने वाले नकारात्मक प्रवृतियों को समायोजित करने के साधन हैं। योग के ज्योत की अलख श्री स्वामी शिवानंद जी ने जलाई ‌जिसको उनके परम प्रिय शिष्य श्री स्वामी सत्यानंद जी ने विज्ञान की कसौटी पर कस कर घर – घर ही नहीं अपितु देश विदेशों में भी पहुंचाया । इसी परंपरा को आगे कायम रखते हुए उनके एकमात्र परम प्रिय शिष्य श्री स्वामी निरंजनानंद सरस्वती जी ने जो ” बिहार योग विद्यालय ” के परम आचार्य एवं संचालक हैं , आधुनिक परिवेश को देखते हुए जीवन शैली के रूप में सर्व सुलभ कराने का प्रयास जारी रखा है । मानवजाति की मानसिकता में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए यम एवं नियम को साधने की आवश्यकता है , जिसे मन को संयमित करके ही संभव है । मन का स्वभाव बच्चे की भांति चंचल है जिसको बल पूर्वक संयमित नहीं किया जा सकता , इसे मैत्री भाव से अनुशासित किया जा सकता है ।मन को अनुशासित करके ही इन्द्रियों को नियंत्रित करने का प्रयास किया जा सकता है । आधुनिक सामाजिक परिवेश को देखते हुए स्वामी जी ने यम और नियम के नूतन आयामों को प्रतिपादित किया है , जैसे यम — अर्थात — प्रसन्नता , क्षमा , इन्द्रिय निग्रह ……आदि नियम — अर्थात — जप , नमस्कार ( विनम्रता ) , मनोनिग्रह ….. आदि ये सभी हमारी दिनचर्या के पहलू हैं जो ठीक वैसे ही एक दूसरे से अनुगुंठित हैं जैसे माला में मोती और धागा । समय के भागते हुए रफ्तार को देखते हुए स्वामी निरंजनानंद सरस्वती जी ने  यम एवं नियम के व्यवहारिक पक्षों की खोज की है और उसके छोटे से छोटे किन्तु महत्वपूर्ण पहलुओं को चलते फिरते अपनाने का मार्ग बतलाया है । —   सं. योगप्रिया (मीना लाल ) ************************************************************************ Readers These are extraordinary times. All of us

दास्तान-ए-इश्क़ भाग # 5

सभी कृष्ण सुदामा से प्रेम नहीं करते, प्रायः नहीं करते।जो कमजोर दिखता है, उसको कुचलने की कोशिश की जाती है PRAVASISAMWAD.COM नौकरी मिल गई और अब मन थोड़ा निश्चिंत हुआ। रोटी की चिंता दूर होने पर चाँद को देखने
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