कैसे एक ज़ीरो-वेस्ट फैशन ब्रांड भूली-बिसरी कलाओं के ज़रिए बिहार की पहचान को नया स्वरूप दे रहा है | Pravasi Samwad
May 30, 2026
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कैसे एक ज़ीरो-वेस्ट फैशन ब्रांड भूली-बिसरी कलाओं के ज़रिए बिहार की पहचान को नया स्वरूप दे रहा है

 

जब सुमति जालान उच्च शिक्षा के लिए बिहार से बाहर गईं, तो उन्हें अक्सर अपने राज्य को लेकर बनी धारणाओं और पूर्वाग्रहों का सामना करना पड़ा। पटना की इस उद्यमी को याद है, “लोग कहते थे कि मैं ‘बिहारी’ नहीं लगती  मानो यह कोई तारीफ हो।” यही अनुभव बाद में उनके लिए प्रेरणा बने और उन्होंने ‘बिहार्ट’ नामक एक सतत (सस्टेनेबल) कपड़ों के ब्रांड की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य बिहार के बारे में बनी गलत धारणाओं को चुनौती देना और उसकी विलुप्त होती पारंपरिक कलाओं को पुनर्जीवित करना है।

साल 2018 में स्थापित और 2020 में व्यावसायिक रूप से शुरू हुआ बिहार्ट एक ज़ीरो-वेस्ट फैशन ब्रांड है, जो आधुनिक डिज़ाइन को बिहार की कम चर्चित पारंपरिक कलाओं के साथ जोड़ता है। हाथ से बुने वस्त्र, सुजनी कढ़ाई, एक्स्ट्रा-वेफ्ट बुनाई, एप्लिक वर्क और हस्तनिर्मित एक्सेसरीज़ के माध्यम से सुमति उन कलाओं को नई पहचान दिलाने का प्रयास कर रही हैं, जो धीरे-धीरे खत्म होती जा रही हैं।

सुमति मानती हैं कि बिहार की सांस्कृतिक पहचान केवल मधुबनी पेंटिंग और भागलपुरी टसर सिल्क तक सीमित नहीं है। सुजनी, मंजूषा, सिक्की, चिंगारी बुनाई, फिशनेट बुनाई और झरना बुनाई जैसी कलाएँ आज भी व्यापक पहचान से वंचित हैं और कलाकारों के रोज़गार की तलाश में बड़े शहरों की ओर पलायन करने के कारण विलुप्त होने के खतरे में हैं।

बिहार्ट के माध्यम से सुमति सीधे स्थानीय कारीगरों और बुनकरों के साथ काम करती हैं। उनके उत्पादों में मल्बरी सिल्क साड़ियाँ, एक्स्ट्रा-वेफ्ट शर्ट्स, टोट बैग, कुशन और अपसाइकल्ड क्रॉप टॉप शामिल हैं। अपने सस्टेनेबिलिटी मिशन के तहत यह ब्रांड कपड़ों के बचे हुए टुकड़ों का इस्तेमाल कढ़ाई और पैचवर्क में करता है, जिससे कचरा लगभग न के बराबर रहता है।

आज बिहार्ट की मासिक बिक्री लगभग 1.5 लाख रुपये तक पहुँच चुकी है और इसके स्टोर गोवा, बेंगलुरु, दिल्ली, उदयपुर और ऋषिकेश तक फैल चुके हैं। मुंबई, पुणे, हैदराबाद, चेन्नई और बेंगलुरु जैसे शहरों के ग्राहक इस हस्तनिर्मित संग्रह को तेजी से अपना रहे हैं।

फैशन के अलावा, बिहार्ट कारीगरों के लिए आजीविका का भी एक मजबूत माध्यम बन चुका है। सुमति की टीम में पूर्णकालिक कर्मचारी होने के साथ-साथ बुनकरों और शिल्पकारों का एक बड़ा नेटवर्क शामिल है, जिन्हें नए पैटर्न और सिलाई तकनीकों का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। कारीगर रूबी देवी, जो अब बिहार्ट के साथ नियमित काम करके पहले से कहीं अधिक कमाई कर रही हैं, कहती हैं कि इस पहल ने न केवल उनके परिवार की आर्थिक स्थिति सुधारी है, बल्कि उनके समुदाय की अन्य महिलाओं को भी यह कला सीखने के लिए प्रेरित किया है।

मास कम्युनिकेशन, साहित्य, भाषाविज्ञान और कानून की पढ़ाई कर चुकीं सुमति बहुराष्ट्रीय कंपनियों और राजनयिकों के लिए बिज़नेस कम्युनिकेशन वर्कशॉप भी आयोजित करती हैं। लेकिन उनका कहना है कि बिहार्ट उनके दिल के सबसे करीब है, क्योंकि यह उन्हें रचनात्मकता, सस्टेनेबिलिटी और सांस्कृतिक पुनर्जागरण को एक साथ जोड़ने का अवसर देता है।

सुमति के लिए यह ब्रांड केवल विरासत को बचाने का माध्यम नहीं, बल्कि लोगों की सोच बदलने का प्रयास भी है। वह कहती हैं, “अब मैं लोगों की सोच में बिहार और उसकी कला को लेकर एक छोटी-सी सकारात्मक बदलाव की झलक देख सकती हूँ।” बिहार्ट की हर बुनाई और हर धागे में यही बदलाव चुपचाप लेकिन गहराई से दिखाई देता है।

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