‘मैं कहीं नहीं जा सकती, लेकिन मेरी गुड़ियाएं दुनिया घूम रही हैं’: राधिका की प्रेरक कहानी - pravasisamwad
June 6, 2026
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‘मैं कहीं नहीं जा सकती, लेकिन मेरी गुड़ियाएं दुनिया घूम रही हैं’: राधिका की प्रेरक कहानी

 

कोयंबटूर की राधिका जेए की जिंदगी बचपन में ही बदल गई थी, जब उन्हें पता चला कि वे एक दुर्लभ बीमारी — ब्रिटल बोन डिजीज (Osteogenesis Imperfecta) — से पीड़ित हैं। इस बीमारी के कारण उनकी हड्डियां इतनी कमजोर थीं कि मामूली हरकत या बिना किसी चोट के भी उनमें फ्रैक्चर हो जाता था। लगातार बढ़ती स्वास्थ्य समस्याओं के चलते उन्हें स्कूल की पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी।

राधिका याद करती हैं, “मुझे हर समय डर लगा रहता था कि कहीं चलने भर से मेरी कोई हड्डी न टूट जाए। धीरे-धीरे मैंने चलना ही बंद कर दिया। पूरा दिन बिस्तर पर बैठकर गुजरता था। मेरे दोस्त नहीं थे और न ही बाहर जाने की कोई आजादी। खिड़की से मैं बच्चों को खेलते, स्कूल जाते और ट्यूशन के लिए निकलते देखती रहती थी। मेरे लिए अस्पताल जाना ही एकमात्र बाहर घूमना था।”

जब उनकी उम्र के दूसरे बच्चे स्कूल और खेल-कूद में व्यस्त थे, तब राधिका ने कला में अपना सुकून ढूंढ लिया। 14 साल की उम्र में उन्होंने ड्रॉइंग और पेंटिंग शुरू की। टीवी पर आने वाले क्राफ्ट कार्यक्रम देखकर वे नई-नई चीजें बनाना सीखती थीं। यही शौक आगे चलकर उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा सहारा बना।

आज 23 वर्षीय राधिका पुरानी अखबारों को खूबसूरत और अनोखी गुड़ियाओं में बदलकर एक सफल व्यवसाय चला रही हैं। उनकी बनाई गुड़ियाओं में नवविवाहित जोड़े, संगीतकार, डॉक्टर, भगवान कृष्ण और गणेश की मूर्तियां समेत कई तरह की कलाकृतियां शामिल हैं।

7 सर्जरी औरउम्रभर का लॉकडाउन

राधिका को पहला फ्रैक्चर महज पांच साल की उम्र में हुआ था। इसके बाद उनकी एक के बाद एक कई सर्जरी हुईं। 12 साल की उम्र तक वे सात बड़ी सर्जरियों से गुजर चुकी थीं।

यह बीमारी एक दुर्लभ आनुवंशिक विकार है, जिसमें हड्डियां बेहद कमजोर हो जाती हैं और आसानी से टूट सकती हैं। कई मरीजों को चलने-फिरने के लिए वॉकर या व्हीलचेयर की जरूरत पड़ती है। फिलहाल इस बीमारी का कोई स्थायी इलाज नहीं है।

राधिका कहती हैं, “कोविड लॉकडाउन के दौरान लोग घर में बंद रहकर परेशान हो रहे थे, लेकिन मेरा पूरा बचपन ही एक तरह का लॉकडाउन था। मैं समझ ही नहीं पाती थी कि मेरे साथ ऐसा क्यों हो रहा है।”

लगातार बिस्तर पर बैठे रहने के कारण उनकी रीढ़ की हड्डी में भी समस्या आ गई और एक और सर्जरी करानी पड़ी। एक समय ऐसा भी आया जब किशोरावस्था में उन्हें लगा कि उनकी जिंदगी खत्म हो चुकी है।

उनके भाई राजमोहन बताते हैं, “एक सर्जरी के दौरान वह दर्द से इतनी टूट चुकी थीं कि ऑपरेशन थिएटर जाते समय उन्होंने पिता से कहा था कि उन्हें इस पीड़ा से हमेशा के लिए मुक्त कर दें। वह हमारे परिवार के लिए बेहद कठिन दौर था।”

हर सर्जरी पर लगभग 35 हजार रुपये खर्च होते थे, जो उनके पिता की लगभग एक साल की कमाई के बराबर था। बावजूद इसके, परिवार ने हार नहीं मानी। घर पर पढ़ाई कराते हुए राधिका को 12वीं तक शिक्षा दिलाई। आज भी उनकी दोनों टांगों में धातु की प्लेटें लगी हैं और वे छड़ी के सहारे चलती हैं।

अखबार से बनी गुड़ियाएं पहुंचीं दुनिया के छह देशों तक

राधिका के जीवन में बड़ा मोड़ तब आया जब उनके भाई ने उन्हें यूट्यूब पर अखबार से गुड़िया बनाने का एक वीडियो दिखाया। उन्होंने पुरानी अखबारों, तारों और रंगों की मदद से अपनी पहली गुड़िया बनाई। पड़ोस की एक महिला ने वह गुड़िया खरीद ली और वहीं से उनकी पहली कमाई हुई।

महज 200 रुपये की पॉकेट मनी से उन्होंने नए रंग खरीदे और अपने शौक को व्यवसाय में बदलना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे उनकी गुड़ियाएं लोगों को पसंद आने लगीं और ऑर्डर बढ़ते गए।

साल 2018 में उन्होंने सोशल मीडिया के जरिए अपनी गुड़ियाएं बेचनी शुरू कीं। आज उनकी कला भारत के 24 राज्यों और अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, श्रीलंका, यूएई समेत छह देशों तक पहुंच चुकी है।

राधिका हर महीने 30 से 50 ऑर्डर पूरा करती हैं और लगभग 15,000 रुपये की कमाई करती हैं। एक गुड़िया बनाने में उन्हें तीन से चार दिन का समय लगता है।

वे कहती हैं, “मैं किसी कार्यक्रम में बिना मदद के नहीं जा सकती, लेकिन मेरी गुड़ियाएं पूरी दुनिया घूम रही हैं। अगर मैं अपनी परिस्थितियों के बावजूद यह कर सकती हूं, तो दूसरी लड़कियां भी अपने सपनों को सच कर सकती हैं।”

आज राधिका न केवल एक सफल उद्यमी हैं, बल्कि स्कूलों और कॉलेजों में जाकर प्रेरक भाषण भी देती हैं। उनका संदेश साफ है — लोगों को दिव्यांग या बीमार व्यक्तियों पर दया नहीं, बल्कि उनकी क्षमता पर विश्वास करना चाहिए। हम किसी से कम नहीं हैं।

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