महाराष्ट्र के ऐतिहासिक सावंतवाड़ी पैलेस के एक शांत कार्यशाला कक्ष में कलाकार कई सप्ताह तक छोटे-छोटे गोल कार्डों पर हाथों से बारीक चित्रकारी करते हैं। हर ब्रश स्ट्रोक एक कहानी कहता है, हर रंग सदियों पुरानी परंपरा को जीवंत करता है और तैयार होने वाला हर कार्ड उस कला को नया जीवन देता है, जो कभी इतिहास के पन्नों में खो जाने वाली थी।
ये हैं गंजीफा कार्ड—भारत के पारंपरिक हस्तचित्रित ताश के पत्ते, जिन्होंने कभी मुगल सम्राटों को मंत्रमुग्ध किया, शाही दरबारों की शोभा बढ़ाई और देश की समृद्ध कलात्मक विरासत का प्रतीक बने। लेकिन बीसवीं सदी में मशीनों से बनने वाले सस्ते ताश के पत्तों ने इस श्रमसाध्य कला को लगभग विलुप्ति के कगार पर पहुँचा दिया।
आज यदि यह अनमोल विरासत जीवित है, तो उसका बड़ा श्रेय सावंतवाड़ी के सावंत भोंसले शाही परिवार को जाता है, जिसने एक मुरझाती परंपरा को फिर से जीवंत सांस्कृतिक धरोहर में बदल दिया।
‘गंजीफा’ शब्द फ़ारसी भाषा के गंज से बना है, जिसका अर्थ है ‘खज़ाना’। 16वीं शताब्दी में यह खेल भारत पहुँचा और जल्द ही मुगल दरबारों में लोकप्रिय हो गया। विशेष रूप से सम्राट अकबर और शाहजहाँ के शासनकाल में इसे राजसी मनोरंजन का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाने लगा।
माना जाता है कि सम्राट अकबर ने आठ सूट और 96 पत्तों वाले गंजीफा सेट को व्यवस्थित रूप दिया। उन्होंने अपने प्रशासनिक ढाँचे से प्रेरित होकर बड़े कार्ड सेट भी विकसित करवाए।

आज के आयताकार ताश के पत्तों से बिल्कुल अलग, गंजीफा के कार्ड गोलाकार होते थे और हर कार्ड हाथों से चित्रित किया जाता था। इन पर अक्सर भारतीय पौराणिक कथाओं के दृश्य उकेरे जाते थे, जिनमें दशावतार, राजाओं, योद्धाओं, रथों, खगोलीय प्रतीकों और शाही जीवन के दृश्य प्रमुख होते थे।
समय के साथ यह खेल देश के अलग-अलग क्षेत्रों में पहुँचा और हर क्षेत्र ने अपनी स्थानीय चित्रकला शैली के अनुसार इसे नया रूप दिया। इसी वजह से गंजीफा अनेक कलात्मक परंपराओं का अनूठा संगम बन गया।
प्रारंभिक गंजीफा कार्ड केवल खेल की वस्तु नहीं, बल्कि विलासिता की पहचान थे। इन्हें हाथीदांत, कछुए के कवच और चंदन की लकड़ी पर बनाया जाता था तथा सोने, चाँदी और बहुमूल्य रत्नों से सजाया जाता था।
लेकिन बीसवीं सदी में सस्ते, मशीनों से बने ताश के पत्ते बाज़ार में आने लगे। धीरे-धीरे हस्तनिर्मित गंजीफा की मांग कम होती गई। एक-एक कर कार्यशालाएँ बंद होने लगीं, कारीगरों ने आजीविका के लिए दूसरे पेशे अपना लिए और भारत की सबसे प्राचीन ताश कला लगभग समाप्त हो गई।

आखिरकार, केवल कुछ ही कारीगर इस परंपरा को जीवित रख पाए।
जब देशभर में गंजीफा कला धीरे-धीरे इतिहास बनती जा रही थी, तब सावंतवाड़ी के शाही परिवार ने इसे बचाने का संकल्प लिया।
यह महसूस करते हुए कि यह कला अपनी जन्मभूमि में भी दम तोड़ रही है, लेफ्टिनेंट कर्नल राजा बहादुर शिवराम सावंत भोंसले और रानी सतवशीलादेवी ने एक अनोखा निर्णय लिया। उन्होंने केवल संरक्षण देने तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि स्वयं इस कला के विद्यार्थी बन गए।
करीब 80 वर्ष के प्रख्यात कलाकार पुंडलिक चितारी से उन्होंने गंजीफा चित्रकला की बारीकियाँ सीखीं। इसके बाद वर्ष 1971 में उन्होंने सावंतवाड़ी लैकरवेयर्स की स्थापना की, ताकि इस सदियों पुरानी कला को संरक्षित और पुनर्जीवित किया जा सके।
धीरे-धीरे उनका महल केवल एक शाही निवास नहीं रहा, बल्कि एक जीवंत कला केंद्र बन गया, जहाँ परंपरा को नई पीढ़ियों तक पहुँचाने का कार्य शुरू हुआ।
आज यहाँ लगभग 20 कुशल कारीगर, जिनमें 13 महिलाएँ भी शामिल हैं, हर कार्ड को हाथों से चित्रित करते हैं, सजाते हैं और लाख की परत चढ़ाकर उसे अंतिम रूप देते हैं। एक पूरा गंजीफा सेट तैयार करने में एक महीने से भी अधिक समय लग सकता है, क्योंकि इसमें धैर्य, सटीकता और असाधारण कौशल की आवश्यकता होती है।
साल 2019 में इस पुनर्जीवन अभियान को नई गति मिली, जब युवरानी श्रद्धा लखम सावंत भोंसले शाही परिवार का हिस्सा बनीं।
उन्होंने गंजीफा को सावंतवाड़ी की सीमाओं से बाहर निकालकर नई पीढ़ी तक पहुँचाने का बीड़ा उठाया। डिजिटल माध्यमों, प्रदर्शनियों और रिलायंस के ‘स्वदेश’ जैसे अभियानों के माध्यम से उन्होंने इस कला को देश-विदेश में नई पहचान दिलाई।
अपने पति युवराज लखम सावंत भोंसले के साथ मिलकर उन्होंने सावंतवाड़ी पैलेस के एक हिस्से को गंजीफा-थीम वाले अनूठे बुटीक होटल में बदल दिया। यहाँ दरवाज़ों के हैंडल से लेकर दीवारों, फर्नीचर और कमरों तक हर जगह गंजीफा कला की झलक दिखाई देती है। होटल के प्रत्येक सुइट का नाम भगवान विष्णु के दशावतारों पर रखा गया है।
गंजीफा को बचाना केवल उसकी तकनीक को जीवित रखने तक सीमित नहीं था, बल्कि उसकी विशिष्ट पहचान को भी सुरक्षित करना आवश्यक था।
इसी उद्देश्य से जनवरी 2023 में शाही परिवार ने भौगोलिक संकेतक (Geographical Indication–GI) टैग के लिए आवेदन किया। इसके लिए उन्हें यह सिद्ध करना पड़ा कि सावंतवाड़ी की गंजीफा परंपरा ओडिशा, आंध्र प्रदेश, राजस्थान और मैसूर की शैलियों से अलग और विशिष्ट है।
लगभग डेढ़ वर्ष के शोध और दस्तावेज़ीकरण के बाद जनवरी 2024 में सावंतवाड़ी गंजीफा को इस कला का भारत का पहला जीआई टैग प्राप्त हुआ। यह केवल एक कानूनी मान्यता नहीं, बल्कि उस विरासत का सम्मान था जिसे शाही परिवार पीढ़ियों से संरक्षित करता आ रहा था।
साल 2025 में गंजीफा की यात्रा ने एक और ऐतिहासिक पड़ाव पार किया, जब इंडिया पोस्ट ने सावंतवाड़ी की गंजीफा कला और दशावतार चित्रों से प्रेरित देश के पहले गोलाकार पोस्टकार्ड जारी किए।

जो कला कभी केवल शाही दरबारों तक सीमित थी, वह अब डाक व्यवस्था के माध्यम से देश के लाखों लोगों तक पहुँचने लगी।
समय के साथ कुछ बदलाव अवश्य आए हैं। आज कलाकार प्राकृतिक रंगों के साथ अधिक टिकाऊ रंगों का भी उपयोग करते हैं, ताकि कार्ड लंबे समय तक सुरक्षित रह सकें। लेकिन गंजीफा की आत्मा आज भी वही है—हर कार्ड हाथों से बनता है, हर चित्र एक कहानी कहता है और हर तैयार सेट सदियों पुराने शिल्प कौशल की गवाही देता है।
गंजीफा की यह यात्रा हमें याद दिलाती है कि विरासत अपने आप जीवित नहीं रहती। उसे बचाने के लिए समर्पण, धैर्य और निरंतर प्रयास की आवश्यकता होती है। सावंत भोंसले शाही परिवार की दूरदृष्टि और अथक प्रयासों ने 500 वर्ष पुरानी इस कला को नया जीवन दिया है और यह सिद्ध कर दिया है कि कुछ धरोहरें इतनी अनमोल होती हैं कि उन्हें इतिहास के हवाले नहीं किया जा सकता।




