June 8, 2026
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कला इतिहासकार ने सिद्दी समुदाय की अनूठी रजाई कला को पहुंचाया विश्व मंच तक

 

कर्नाटक के बैचवाड़ गांव के एक छोटे से बस्ती में कुछ महिलाएं रंग-बिरंगी रजाइयों के इर्द-गिर्द बैठी हैं। उनके हाथ तेजी से कपड़ों के टुकड़ों को जोड़ते हैं, जबकि सुई-धागे से उभरते पैटर्न उनकी पहचान, इतिहास और संस्कृति की कहानी बयां करते हैं। ये साधारण रजाइयां नहीं हैं, बल्कि सिद्दी समुदाय की जीवित विरासत हैं।

सिद्दी समुदाय, जो आज कर्नाटक, गुजरात और आंध्र प्रदेश के कुछ हिस्सों में रहता है, सदियों पहले पूर्वी अफ्रीका के बंटू समुदाय से भारत आया था। अरब, पुर्तगाली और ब्रिटिश शासकों के दौर में कुछ लोगों को गुलाम बनाकर लाया गया, जबकि कुछ व्यापारी और नाविक के रूप में यहां पहुंचे। समय के साथ वे भारतीय समाज का हिस्सा बन गए, लेकिन अपनी सांस्कृतिक पहचान को उन्होंने आज भी संजोकर रखा है।

बेंगलुरु की कला इतिहासकार अनीता एन की मुलाकात इस समुदाय से वर्ष 2015 में हुई। यह मुलाकात उनके एक मित्र की शादी के दौरान हुई, जिसकी दुल्हन सिद्दी समुदाय से थी।

“शादी जंगल के बीच हुई थी। हम तीन दिनों तक वहां रहे और समुदाय के लोगों के साथ समय बिताया। यहीं से मेरा सिद्दी समुदाय से जुड़ाव शुरू हुआ,” अनीता बताती हैं।

एक रजाई ने बदल दी दिशा

अनीता हर साल अपने मित्र के परिवार से मिलने जाती थीं और उनके लिए कपड़े भी ले जाती थीं। एक दिन उन्होंने देखा कि उनके द्वारा दिया गया एक पुराना कपड़ा एक खूबसूरत रजाई का हिस्सा बन चुका था।

“मैं उस रजाई को देखकर हैरान रह गई। जब मैंने इसके बारे में पूछा तो पता चला कि यहां कोई भी कपड़ा बेकार नहीं माना जाता। पुराने और फटे कपड़ों को जोड़कर नई रजाइयां बनाई जाती हैं,” वे कहती हैं।

इस कला ने अनीता को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने इसकी असली कारीगर महिलाओं को खोजने का निर्णय लिया। जंगलों और दूर-दराज के घरों तक पहुंचने के बाद वे उन महिलाओं से मिलीं जो वर्षों से यह कला अपने परिवार और समुदाय के लिए करती आ रही थीं।

सिद्दी समुदाय में रजाई बनाना, जिसे स्थानीय रूप से ‘कवांडी’ कहा जाता है, केवल हस्तकला नहीं बल्कि सामुदायिक परंपरा है। शादी, जन्म और अन्य अवसरों के लिए अलग-अलग तरह की रजाइयां बनाई जाती हैं।

अनीता बताती हैं, “जब किसी लड़की की शादी होती है, तो महिलाएं मिलकर ऐसी रजाइयां बनाती हैं जिनमें उत्सव और परिवार की झलक दिखाई देती है। हर रजाई की अपनी कहानी होती है।”

इसी कला को पहचान दिलाने और महिलाओं के लिए आजीविका का साधन बनाने के उद्देश्य से अनीता ने ‘सिद्दी कवांडी’ पहल शुरू की। उन्होंने कार्यशालाओं का आयोजन किया और इन रजाइयों को देशभर के लोगों तक पहुंचाने का प्रयास शुरू किया।

सिद्दी समुदाय में रजाइयां केवल उपयोग की वस्तु नहीं हैं, बल्कि पारिवारिक स्मृतियों का हिस्सा होती हैं। पुराने कपड़ों और घिसे हुए कपड़ों की परतों को जोड़कर इन्हें तैयार किया जाता है। फिर ये रजाइयां एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक विरासत के रूप में सौंपी जाती हैं।

आज अनीता कर्नाटक के कई गांवों की लगभग 60 महिलाओं के साथ काम कर रही हैं। वे महिलाओं को सामग्री उपलब्ध कराती हैं और उनके काम के घंटे के आधार पर भुगतान करती हैं, ताकि उन्हें नियमित आय मिल सके।

समुदाय से जुड़ी राजमाबी कहती हैं, “पहले हम इसे घर का सामान्य काम समझते थे। अब हमें एहसास हुआ है कि यह एक कला है, जिस पर गर्व किया जा सकता है। लोग अब हमारी कारीगरी की सराहना करते हैं।”

आज ये अनोखी रजाइयां भारत के अलावा अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और जर्मनी तक पहुंच रही हैं। हर रजाई अलग होती है और उसे पूरा करने में महीनों, कभी-कभी वर्षों तक का समय लग सकता है।

अनीता कहती हैं, “ये महिलाएं कपड़ों से चित्र बनाती हैं। उनके लिए कपड़ा सिर्फ सामग्री नहीं, अभिव्यक्ति का माध्यम है।”

हर महीने करीब 40 रजाइयां तैयार होती हैं, जिन्हें प्रदर्शनियों और सोशल मीडिया के जरिए बेचा जाता है। अनीता का सपना है कि इस पारंपरिक कला को समकालीन कला के साथ जोड़कर दुनिया के सामने और बड़े स्तर पर प्रस्तुत किया जाए।

वह मुस्कुराते हुए एक घटना याद करती हैं, “मैंने एक बार पूछा था कि एक रजाई बनाने में कितना समय लगता है। एक महिला ने जवाब दिया—‘मेरे साथ बैठकर बनाओ, तब पता चलेगा कि यह कब पूरी होगी।’ तभी मुझे समझ आया कि इस कला को घंटों या दिनों में नहीं मापा जा सकता। इसमें समय नहीं, जीवन बुना जाता है।”

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