March 31, 2026
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पटना कलम: रंगों में सजी आम जिंदगी की अनकही दास्तान

 

अक्सर “19वीं सदी का इंस्टाग्राम” कहे जाने वाला पटना कलम केवल एक कला शैली नहीं था, बल्कि उस दौर के जीवन की धड़कनों को कैनवास पर उतारने वाली एक जीवंत कहानी थी। 18वीं से लेकर 20वीं सदी के प्रारंभ तक बिहार में फलती-फूलती इस परंपरा ने मुगल दरबार की भव्यता से अलग हटकर आम लोगों के जीवन को केंद्र में रखा—उनकी दिनचर्या, उनके पेशे, उनके उत्सव और उनकी साधारण-सी दिखने वाली परंतु गहरी अर्थपूर्ण दुनिया।

पटना के कलाकारों की विशेषता उनकी तकनीक में भी झलकती थी। वे चित्रों को सीधे ब्रश से बनाते थे, बिना किसी प्रारंभिक रेखांकन के—एक आत्मविश्वास भरी शैली जिसे काजली स्याही कहा जाता था। उनकी कला में एक स्वतंत्र पहचान थी, जो न तो पूरी तरह मुगल थी और न ही राजपूत शैली जैसी। वे अपने रंग, ब्रश और कागज़ तक स्वयं तैयार करते थे—जैसे उनके पूर्वज मुगल दरबारों में किया करते थे।

इन चित्रों के रंग भी प्रकृति से ही जन्म लेते थे—फूलों, पत्तियों, धातुओं और पेड़ों की छाल से। गहरे सेपिया और लाल-गेरुए रंगों में उकेरी गई आकृतियाँ, फीके सफेद वस्त्रों पर हल्की धूसर छायाएँ, और कहीं-कहीं गहरे क्रिमसन, सुनहरे या मोर-नीले रंग की झलक—सब मिलकर एक शांत, सौम्य सौंदर्य रचते थे। समय के साथ, जब यूरोपीय बाजार का प्रभाव बढ़ा, तो इन रंगों में भी परिवर्तन आया—चमकीले मुगल रंगों की जगह गंभीर और सधे हुए रंगों ने ले ली। छायांकन की शैली भी बदली—गहरे रंगों की जगह अब हल्के वॉटरकलर जैसी परतों से गहराई रची जाने लगी।

कलाकारों के औज़ार भी उतने ही अनोखे थे। बारीक काम के लिए गिलहरी की पूँछ के बालों से बने ब्रश, और मोटे कार्य के लिए बकरी, सूअर या भैंस के बालों का उपयोग किया जाता था। कागज़ भी वे खुद बनाते थे—कभी कपास और पुराने कपड़ों से, तो कभी नेपाल से आए जूट या बाँस के हस्तनिर्मित कागज़ से। बाद में यूरोप से आए मशीन-निर्मित कागज़ का भी इस्तेमाल होने लगा।

इन चित्रों का सबसे बड़ा आकर्षण उनके विषय थे—पटना शहर का रोज़मर्रा का जीवन। यहाँ धोबी, दर्जी, फेरीवाले, चूड़ी बेचने वाले, मछली विक्रेता, लोहार, बढ़ई, मिठाई बनाने वाले—हर कोई कला का हिस्सा बन जाता था। यहाँ तक कि यूरोपीय घरानों के दृश्य भी उकेरे जाते थे—बाज़ार से लौटते बटलर, नौकर-चाकर और कुत्तों को घुमाते सफाईकर्मी। त्योहारों, शादियों और उत्सवों की रंगीन झलकियाँ भी इन चित्रों में जीवित हो उठती थीं।

इतिहास की धारा के साथ यह कला भी बहती रही। माना जाता है कि इसके कलाकार मूल रूप से राजस्थान के प्रतापगढ़ से मुगल दरबार पहुँचे, फिर औरंगज़ेब के समय संरक्षण घटने पर मुर्शिदाबाद चले गए। 1757 के प्लासी के युद्ध के बाद वे पटना आए और यहीं इस शैली ने अपना पूर्ण रूप लिया। ब्रिटिश अधिकारी इन चित्रों को स्मृति-चिह्न के रूप में खरीदते थे—मानो वे इस भूमि की कहानियाँ अपने साथ ले जा रहे हों। आज भी इनकी कई उत्कृष्ट कृतियाँ ब्रिटेन के संग्रहालयों में सुरक्षित हैं।

लेकिन समय के साथ यह जीवंत परंपरा मद्धम पड़ने लगी। फोटोग्राफी का आगमन, ब्रिटिश संरक्षण का समाप्त होना और 1950 में अंतिम पारंपरिक कलाकार ईश्वरी प्रसाद वर्मा का निधन—इन सबने मिलकर पटना कलम को लगभग विलुप्ति के कगार पर पहुँचा दिया। आज स्थिति यह है कि नई पीढ़ी में भी इसके प्रति रुचि सीमित हो गई है।

फिर भी, उम्मीद की एक किरण बाकी है। कुछ समर्पित कला प्रेमी और संस्थान इस खोती हुई विरासत को फिर से जीवित करने का प्रयास कर रहे हैं—कार्यशालाओं, प्रदर्शनियों और जागरूकता अभियानों के माध्यम से।

पटना कलम की यह कहानी सिर्फ एक कला के उत्थान और पतन की नहीं, बल्कि उस समाज की है, जिसने अपनी साधारण-सी जिंदगी को असाधारण संवेदनशीलता के साथ चित्रों में संजोया। यह भारत की सांस्कृतिक विरासत का एक अनमोल अध्याय है—जो आज भी पहचान, संरक्षण और पुनर्जीवन की प्रतीक्षा कर रहा है।

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